धरती और बीज

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

धरती-बीज और मानव


गत अध्याय में इस तथ्य पर विचार किया जा चुका है कि धरती और बीज का संबंध एकांतिक नहीं है, उसका संबंध ऐकांतिक नहीं है, उसका संबंध सम्पूर्ण चराचर प्रकृति से है।   दिक् और काल, सूरज, चंदा, नक्षत्रमंडल, वायु, मेघ, ॠतुचक्र सभी के साथ बीज का अंत:संबंध है।   सृष्टि में सबकुछ गतिशील है।   हवा चलती है, नदियाँ बहती हैं, समुद्र में तरंगें उठती हैं, दिन और रात होते हैं, काल कि गति के साथ सबकुछ गतिशील है और वही गति बीज में भी है।   धरती और बीज का ऐसा अंत:संबंध है कि बीज सौ-सौ गतियों    के साथ धरती पर पहुँच जाता है-वायु में बहकर, जल प्रवाह में बहकर, पक्षी की बीट के साथ, पशु के गोबर के साथ और फिर धरती की कोख में स्थापित हो जाता है।   इसके बाद अंकुरित होता है, पल्लवित और पुष्पित होता है, बढ़ता है और पूर्ण वृक्ष बन जाता है और पुन: अपनी सम्पूर्ण जीवनी शक्ति को बीज में स्थापित कर देता है, ताकि पुन: नया जन्म ले सके।   सम्पूर्ण जीव-दृष्टि में यही प्रक्रिया निरंतर चल रही है।   इस प्रक्रिया को लोक और शास्र दोनों ने पंचमहाभूतों की प्रक्रिया के रुप में पहचाना है।   जिस प्रकार बीज-वृक्ष का सम्पूर्ण जीवन पृथ्वी, जल, प्रकाश-ऊष्मा (तेज), वायु और आकाश की प्रक्रिया है, वही बात मानव-जीवन के संबंध में भी कही जा सकती है।   बीज-वृक्ष जिन तत्त्वों को संचित करते हैं, वे तत्त्व भोजन के माध्यम से मानव-शरीर में पहुँच जाते हैं।

१. बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज-इस चक्राकार जीवन-गति के साथ बीज की एक दूसरी गति भी है।   यही बीज अन्न के रुप में प्राणियों के शरीर में पहुँचकर प्राण बन जाता है।   अन्न के बिना प्राणों की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

       अन्न भोजन है और भोजन सम्पूर्ण प्राणियों की आधारभूत आवश्यकता है।

१.१. अन्न : जीवन का उद्गम

उपनिषदों में अन्न को ब्रह्म (तै. ३.२.१) तथा प्रजापति कहा गया है-

       अन्नाद्वेै प्रजा: प्रजायन्ते, अथो अन्नेन जीवंति (तै. २.२.१)

       अन्नाद्भूतानि जायंते जातान्यन्नेन वर्धन्ते (वही)

       अन्नं वै प्रजापति: (प्रश्न ३.१.१४)

       अर्थात् जो स्थूल शरीर उत्पन्न हुआ, वह अन्न ही है।   अन्न में सब जीव रहते हैं।   अन्न से ही उत्पन्न होते हैं तथा अन्न से जीवित रहते हैं।   प्राण अन्न का ही रस है, अन्न ही प्रजापति है।   अन्न से रेत बनता है, रेत से प्रजा की उत्पत्ति होती है।   सब पशु-पक्षी भी अन्न खाते हैं, अन्न से वीर्य बनता है और उससे संतानोत्पत्ति होती है।   अन्न से शरीर ही नहीं मन भी बनता है-'जैसौ खाये अन तैसो होय मन।'

       यह अन्न औषधि-वनस्पतियों से संभूत है, इसलिए बीज जीवन का उद्गम है।

२.

मनुष्य के शरीर और प्राणों में बीज की शक्ति होने के कारण बीज-वृक्ष के साथ मानव-जीवन का ओतप्रोत संबंध है।   यह उल्लेखनीय है कि मनुष्य परिवेश के रुप में बीज को प्रभावित करता है और बीज से प्रभावित भी होता है।   कृषि का इतिहास बीज को प्रभावित करने के इतिहास के रुप में समझा जा सकता है।

       मानव-जीवन की प्रक्रियाओं को स्थूल रुप में हम दो भागों में बाँट सकते हैं (रेखाचित्र-८)।

       १. भौतिक प्रक्रिया

       २. मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया

२.१. भौतिक प्रक्रिया

मानव-जीवन की भौतिक प्रक्रिया से भौतिक परिवेश की रचना होती है।   मनुष्य की भौतिक प्रक्रिया के मूल में भूख और रक्षा की मूल प्रवृत्तियाँ हैं।   भूख और रक्षाप्रवृत्ति ने मनुष्य की जीवन-यात्रा को प्रेरित और उत्तेजित किया है।   मनुष्य का जीवन-संघर्ष भूख से प्रेरित है और इसी के निमित्त उसने धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक की यात्रा की है।   भौतिक प्रक्रिया के फलस्वरुप मनुष्य भोजन, रक्षा और आच्छादन-प्रणाली का विकास करता है।   ये प्रणालियाँ ही इतिहास में सभ्यता कही जाती हैं।   इस अध्याय में हम अध्ययन कर रहे हैं कि धरती और बीज-संबंध ने मनुष्य-जीवन को भौतिक रुप से किस प्रकार प्रभावित किया है।

२.२. मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया

यद्यपि भौतिक और मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया एक-दूसरे-से प्रभावित होती हैं और एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं फिर भी अध्ययन की सुविधा के लिए मनुष्य के मनोवैज्ञानिक परिवेश अथवा संस्कृति को दूसरे वर्ग में रखा जा सकता है।   इसके अंतर्गत चिंतन-प्रणाली, अभिव्यक्ति प्रणाली, सौंदर्यबोध विश्वास प्रणाली तथा आचार-प्रणाली का समावेश होता है।   धरती और बीज की प्रक्रिया ने मनुष्य के सम्पूर्ण चिंतन, अभिव्यक्ति, सौंदर्यबोध, आचार और विश्वास को किस रुप में तथा किस प्रकार प्रभावित किया है, इसका अध्ययन हम आगे के अध्यायों में करेंगे।  

 

 

 

३.

अन्न मनुष्य की सभ्यता का आधार है।   अन्न की महिमा से संबंधित अनेक कहावतें लोकजीवन में प्रचलित हैं-

              अन्नै नाचै अन्नै कूदै अन्न लड़ै परकोटन ते।

              तपसी ऊ तप तबई करंगे पेट भरेंगे रोटन से

                            अथवा

              रोटी ते ही ब्याह होत है, रोटी ते ई काज।

              सही बड़ेन्नें कही है, सबसे बड़ौ अनाज।

       जो भूखा है, सो रुखा है।   मनुष्य के पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सभी संबंध अन्न के आधार पर टिके हुए हैं।   मानव-जीवन के सभी उद्योगों का आधार भोजन है।

       अन्न के रुप में यह भोजन प्रकृति से मिलता है, इसलिए प्रकृति से मनुष्य के संबंध का आधार भोजन है।   जब भोजन का स्वरुप बदलता है तब प्रकृति से मनुष्य का संबंध भी बदलता है और उसी के साथ मनुष्य का जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा आस्था-विश्वास भी बदलते हैं।   परिवर्तन की इस प्रक्रिया को ब्रज की लोककहानियों में विद्यमान मानव सभ्यता के निम्नलिखित प्रंसगों के माध्यम से समझा जा सकता है।

३.१. कृषि-पूर्व सभ्यता

दानव-संबंधी कहानियों में उस युग की स्मृतियाँ मौजूद हैं, जब जंगल से गाँव बन रहा था।   दानव गुफा में रहता था, मानव रक्त पीता था और मानव-मांस खाता था।   उसके भोजन के लिए नगर से बारी-बारी एक आदमी की बलि भेजी जाती थी।   नगर से किसी सुंदरी का अपहरण करके लाता था, जो उसके यहाँ बंदिनी का जीवन व्यतीत करती थी।   वाराह, गरुड़ जैसे पशु-पक्षी एवं वट और पीपल जैसे वृक्ष तथा साँप की अलौकिक शक्ति में उसका विश्वास है।   उसके चिंतन में धरती साँप के फन या वराह के दंष्ट्र पर टिकी है।

३.२. गोप सभ्यता

गोप सभ्यता में जीविका का आधार गाय है और वही धन है।   दूध, दही और मक्खन का आहार है।   कामधेनु के रुप में गाय की अलौकिक शक्ति में उसका विश्वास है।   उसका विश्वास है कि धरती गाय के सींग पर टिकी है।   क्षीर सागर और समुद्र-मंथन गोप संस्कृति की अवधारणाएँ हैं।   गोपाल और गोवर्द्धन उसके देवता हैं।   गोदान और गौसंरक्षण जहाँ पुण्य है वहाँ गौहत्या पाप है।

३.३. धरती और बीज की सभ्यता : कृषि सभ्यता

धरती और बीज के संबंध को जिस दिन मनुष्य ने समझ लिया था, उस दिन धरती पर एक नयी सभ्यता का जन्म हुआ था।   जिस दिन धरती और बीज की सभ्यता का अवतार हुआ था, उस दिन सम्पूर्ण परिवेश के साथ मनुष्य का नया संबंध बना था-धरती के साथ नया संबंध, प्रकृति के साथ नया संबंध और समाज के साथ नया संबंध।   मेघ, वायु, अग्नि, सूर्य और चंद्रमा के संबंध में मनुष्य ने एक नयी दृष्टि पायी थी तथा परिवार, जाति, वर्ग और राज्य की नयी अवधारणाएँ बनी थीं।   कृषि सभ्यता ने जंगलों को खेत बनाया और गाँवों का उदय हुआ।   धरती का धन के रुप में व्यवहार हुआ, भूपति और जमींदार जैसे वर्ग बने।

       खेती से पहले मनुष्य का यायवर जीवन था।   वह एक जंगल से दूसरे जंगल में जाकर भोजन की खोज करता था पर जब उसने खेत बनाया तो गाँव बस गया।   खेती की सभ्यता में मनुष्य ने धरती को माँ के रुप में पहचाना क्योंकि पक्षियों को फल-फूल, पशुओं को चारा तथा मनुष्य को अन्न धरती से ही प्राप्त होता है।   खेती के कारण ही मनुष्य का धरती से वह संबंध बना, जिसे हम आज देशभक्ति और राष्ट्रीयता के रुप में जानता हैं (सारणी-३)।  

       ३.३.१. वन्य-संस्कृति का कृषि-संस्कृति में संक्रमण : वन्य-संस्कृति के विश्वासों का कृषि-संस्कृति में नया संस्करण हुआ।   वन्य-संस्कृति का देवता 'बलि' ग्रहण करता था, कृषि-संस्कृति में वह अन्न और अन्न से बनी सामग्री का भोग लगाने लगा।   वन्य-संस्कृति से चली आ रही प्रणालियाँ अपना रुप-रंग बदलकर जीवित रहीं, जैसे बलि में उड़द के दानों को सिंदूर में लपेटकर रखा जाता है, यह मांस का स्थानिक है।   उसी प्रकार दुर्गा-पूजा में पेठे अथवा तरबूजे को काटना अथवा नारियल को फोड़ना बलि का ही प्रतीक है।   डॉक्टर सत्येंद्र ने 'लोकजीवन और संस्कृति' निबंध-१   में सकटचौथ की वार्ता का उल्लेख किया है, जिसमें तिलकुटे की मनुष्य जैसी आकृति बनाई जाती है।   मुख पर घी और गुड़ रखा दिया जाता है।   घर का कोई बालक या पुरुष (बालिका या स्री नहीं) चाकू से उसका सिर धड़ से अलग कर देता है।   काटते समय वह 'मैंऽऽ' की आवाज करता है।   कटा हुआ सिर (तिलकुटा) गुड़ और घी काटनेवाले को मिलता है।

       'सकटचौथ' की यह 'तिलकुटा-बलि' बड़े स्पष्ट रुप में वन्य-संस्कृति की प्रथा के धरती और बीज की संस्कृति में हुए संक्रमण और संस्करण की कहानी कह देती है।

 

सारणी-३ : ब्रज की लोक-कहानियों में प्राप्त

वन्य समाज, गोप समाज तथा कृषि समाज

 
  वन्य समाज गोप समाज कृषि समाज
भोजन

 

मांस कंदमूल फल दूध अन्न
जाति

 

ॠषि, असुर, दानव, आदिवासी, भील, बहेलिया, डाइन गोप कृषक उत्पादन के आधार पर अनेक जातियों का विकास
आवास

 

गुहा-कंदरा जंगल रथ मँझोली, गाड़ी वन-उपवन अटा तिवारी, झोंपड़ी कुआँ, गाँव
उपकरण

 

धनुष, बाण, शिकार  पहिया, लाठी गाड़ी, हल, मूसल, बैल, खुरपी, फावड़ा
आच्छादन

 

मृगछाल, बघछाल  वस्र  कपड़ा-वस्र 
देवता

 

वृक्ष-नाग देवता पशु-पक्षी देवता गौदेवता  धरती, मेघ, इन्द्र, अन्न, वृक्ष

 

४.   अकाल

लोक-कहानियों में अकाल-संबंधी अनेक प्रसंग आते हैं।   इस प्रकार की अनेक कथाएँ मिलती हैं, जिनमें अकाल पड़ने पर पूरी आबादी ने 'देश' छोड़कर स्थानांतरण किया था।   इस प्रकार की कहानियाँ मिलती हैं, जिनमें अकाल पड़ा, तो व्यक्ति अपने कहने से 'मुकर' गया परंतु जब 'सुकाल' आया तो उसने पूरे दाम चुका दिए।

       अकाल का समय आपात्काल माना गया है, जिसमें मर्यादा शिथिल हो जाती है, समाज और परिवार के संबंध बिखर जाते हैं।   'मेघासिन' के गीत में आता है कि अकाल पड़ने पर भैया ने बहन छोड़ दी, नारियों ने प्रिय छोड़ दिए तथा गायों ने अपने बछड़े छोड़ दिए।

               रानी हारीन छोड़ी हाथोहेली भैयन छोड़ी बहिन

               रानी बैलन जूआ डारियौ नारिन त्यागे हैं पीउ।

               रानी गायन बछड़ा छोड़ियो भेसिन सूखौ है दूध।

               रानी आय इन धीर बँधाइयौ और बरसौ गहर गंभीर।

५. अन्न

कृषि-समाज में अन्न धन ही सबसे बड़ा धन माना जाता है-'जाकी नार सुलाखनी, ताके कोठी धान' अथवा 'सोई नार बड़ी ठकुरानी जाकी कुठिया ज्वार।' अथवा

       अन्न-धन अनेक धन सोनौ-चाँदी आधौ धन और पूँछ डुलावन कुछ नहीं।

       गाँवों में कुछ वर्षों पहले तक मुद्रा का प्रचलन कम था, अन्न के आदान-प्रधान से ही व्यवहार चलता था।   खेतिहर मजदूरों को तो अभी भी उनका पारिश्रमिक अन्न के रुप में ही दिया जाता है।   अन्न का ही दान किया जाता है और अन्न के द्वारा ही शुभकामना और आशीष दिया जाता है।

५.१. जीवनोपयोगी उपकरण

बीज वृक्ष-वनस्पति केवल भोजन और औषधि के रुप में ही मनुष्य के जीवन में नहीं आए, उनसे मनुष्य के आवास तथा आच्छादन की प्रणाली का भी विकास हुआ और जीवन में काम आनेवाले अनेक उपकरणों का भी निर्माण हुआ।   बाँस की झोंपड़ी बनी, फूंस का छप्पर पड़ा, ढाक के पत्तों की पत्तल बनी, अरहर की लकड़ी की डलिया बनी, सरकंडों की सिरकी और कुश की चटाई बनी, लकड़ी से गाड़ी बनी, पहिया बना, नाव बनी, चौकी बनी, सन से रस्सी बनी और खजूर का पंखा बना।   कपास के रुई, सूत और वस्र बने।-२

६.

किसान का सबसे पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण कृत्य है जोतना।   कर्षतीति कृषक: अर्थात् जो कर्षण करे (जौ जोते) उसकी संज्ञा कृषक (किसान) है।   कहावत है कि-'जो हल जोतै खेती बाकी और नहीं तौ जाकी-ताकी।' अर्थात् जो हल चला कर खेतों को जोतता है, खेती उसी की होती है, जो हल नहीं चलाता, वह खेती नहीं कर सकता।   किसान शब्द का पर्यायवाची है खेतिहर तथा कृषि का पर्यायवाची शब्द है खेती।   खेत शब्द क्षेत्र से बना है, यह क्षेत्र बीज का ही क्षेत्र है।   किसान इस क्षेत्र की रचना करता है अर्थात् धरती को जोतकर बीज के अनुकूल स्थिति बनाता है, धरती को तैयार करता है कि वह अपने गर्भ में बीज को ग्रहण करे।

       जोतने से मिट्टी की निचली परत ऊपर आ जाती है, उसको हवा लगती है तथा सूर्य की किरणें पड़ती हैं।   जोतने से पहले पानी भी दिया जाता है, इस प्रकार हवा, पानी और सूरज की किरणों से धरती का नया संस्कार होता है, ताकि उसमें नए जीवन का संचार हो सके।   'पंचीकरण प्रक्रिया' शब्द को किसान भले ही न जाने परंतु तत्त्व के रुप में वह पहचानता है कि जोतने का संबंध धरती, पानी, हवा और सूरज की किरणों से है।   जुताई का वर्षा से जो संबंध है, किसान उसे पहचानता है, यही कारण है कि आषाढ़ मास की प्रारंभिक वर्षा होने पर जो साधारण जुताई होती है, उसे वह 'खुर्रट' कहता है तथा 'गडगड्ड' का मेह (वर्षा) पड़ने पर जो जुताई की जाती है, उसे वह 'उपार' कहता है।   दो जोत देने के बाद खेत को खाली छोड़ दिया जाता है ताकि धरती सूर्य की किरणों से ऊर्जा ग्रहण कर सके और उसका कायाकल्प हो सके।

६.१. परंपरागत कृषिशास्र

खेत में किसान के प्रत्येक कार्य-जुताई, बुवाई, सिंचाई, नराई, रखाई, कटाई और गहाई का संबंध धरती और बीज की प्रक्रिया से है।   किस बीज को कितनी दूर पर बोया जाना चाहिए?   किस बीज को कितना गहरा बोना चाहिए?   किस बीज को कब और कितना बोना चाहिए?   किस बीज के साथ किस बीज को बोया जा सकता है?-आदि प्रश्न कृषिविज्ञान के क्षेत्र में आते हैं।

७. धरती-बीज और परिवार की प्रणाली

किसान धरती और बीज के संबंध का प्रत्यक्ष द्रष्टा है, उसका सम्पूर्ण जीवन बीज के जीवन-चक्र से जुड़ा है।   किसान को पूरे वर्ष खेत में ही रहना होता है, क्योंकि खेती का काम कभी समाप्त नहीं होता, कहावत है-'किसान-नितनई' अर्थात् किसान के पास नित्य नया काम है और प्रत्येक काम को यथा अवसर पूरा करना है, एक क्षण भी चूक जाय तो जीती बाजी भी हार में बदल सकती है।   एक फसल घर आती है और दूसरी फसल के लिए प्रयास प्रारंभ हो जाता है।   किसान का पूरा परिवार खेती के काम से जुड़ा हुआ है।   ननद और भाभज 'बन' बीन रही हैं, बेटी चिड़िया रखा रही है, ससुर क्यारी बना रहा है, सास गा रोप रही है, देवर और भाभी पानी लगा रहे हैं।   कोई गाय दुह रहा है, कोई बैल हाँक रहा है, कोई सानी लगा रहा है, और कोई कुटी काट रहा है, खेत के लिए परिवार के सभी सदस्यों के पसीने की जरुरत है, इसलिए परंपरागत कृषि में संयुक्त परिवार-प्रणाली का विकास होता है।

७.१. श्रम संबंध

खेती में भराई, जुताई, बुवाई, नराई, रखाई, कटाई तथा दाँय चलाने (गहाई) के काम से जुड़े हुए श्रमिकों की पहचान उनके कार्य से जुड़ी हुई थी।   'परछिया' कुएँ के 'पारछे' पर खड़ा होकर 'पुर' लेता था तथा पानी ढलता था।   कीलिया बैलों को हाँकता था तथा 'पल्लगा' खेती में पानी लगाता था।   जोतनेवाला जुतैया कहलाता था तथा सुहागे (पटेला) से खेत को चौरस करनेवाला सुहागिया कहलाता था।   माँजिया माँजा से क्यारी की मेंड़ बनाता है।   नराई करनेवाला नरावा और फसल काटनेवाला 'लावा' कहा जाता है।-३   खेत में पड़ी रह गयी बालें बींननेवाली मजदूरिनें सिलहारी कही जाती हैं।

खेती-संबंधी श्रम-विभाजन में स्रियों के कार्य अलग से वर्गीकृत हैं।   खेत पर कलेवा ले जाना और लौटते समय पशुओं के लिए चारे की गठरी लाना, बीज बोना, कपास बीनना, सिल बीनना, मक्के की भुटिया सोंटना, मेहरा पर बैठकर चिड़िया उड़ाना, लकड़ी बीनकर बोझा लाना, कुटी काटना, चने की फलक चोंटना, पोखर से मिट्टी लाना, सरसों फटकना, कूटना, पीसना, छानना और बीनना स्रियों के कार्य हैं।

.. उद्योग-व्यवसाय और बिरादरी

धरती और बीज के उत्पाद से उद्योग और व्यवसाय का जन्म होता है तथा उद्योग और व्वयसाय से बिरादरियाँ बनती हैं।-

           पान का संबंध पनवाड़ी और तमोली जाति से है।   पीपल, पाकर, बेर और शीशम की शाखाओं पर लाल-लाल पदार्थ होता है, इसे लाख कहते हैं, इसी से महावर (लाक्षारस) तथा रोशनाई बनायी जाती है।   लाख की जूड़ी भी बनती है, इस काम को करनेवाल 'लखेरा' कहलाता है।

           गाँडर, सन, नरई, नारियल की जटा, भाभर, पतेर, काँस, सरकंडा आदि से जेवरी, रस्सी, चटाई, मूढ़े, सिरकी, आसन, सींक, चिक बनती हैं तथा खजूर के पत्तों से बुहारी, पंखा और बोइया।   खस से टटिया बनती है।   यह काम करनेवाली बिरादरियाँ हैं नट और कंजर।   नट सूप, छान, छप्पर और टोकरी भी बनाते हैं।   घास खोदनेवाले को घसखोदा कहते हैं।

           फूल का संबंध माली से है।   माली फूलों का हार, फूलों के गहने, सेहरा तथा गुलदस्ता बनाता है।   गुलाब, चमेली, बेला, चंदन, खस और रातरानी से इत्र और फुलेल बनाए जाते हैं।   गुलाबजल गुलाब के फूलों से निकाला जाता है तथा इस कार्य को करनेवाली जाति अत्तार और गंधी कहलाती है।   रँगरेज मजीठ, हल्दी, केसर, टेसू तथा मेहँदी से रंग निकालता है।   बरगद तथा ढाक के पत्तों से दौना और पत्तल बनाने का काम करनेवाली जाति बारी कही जाती है।   भड़भूजा अनाज को भूनता है तथा चावल से 'मुरमुरा', 'खील' एवं मक्के का फूला बनाता है, चना तथा मूँगफली को भूनता है।   लकड़ी काटनेवाला लकड़हारा कहलाता है।

           कपास को रुई और रुई को कपड़ा बनने तक की यात्रा में कई अवस्थाओं में गुजरना पड़ता है।   अलग-अलग अवस्थाओं के अलग-अलग काम हैं और ये अलग-अलग बिरादरियाँ करती हैं-रुई धुननेवाला कढ़ेरा या धुना कहलाते हैं, सूत कातनेवाली कत्ती कहलाती है।   कोरी और जुलाहे कपड़ा बुनते हैं, रँगरेज कपड़ा रँगता है, छीपी कपड़े छापता है, दर्जी कपड़ों की सिलाई और धोबी धुलाई करता है।   तिल और सरसों से तेल निकालनेवाली बिरादरी तेली कहलाती है।   अंडी, सूरजमुखी, दुआँ, लाहा और नारियल से भी तेल निकाला जाता है।   ईख को कोल्हू में पेरकर रस निकालने और इससे गुड़ बनाने का काम भी गाँवों में होता है।  

           कपास, ईख और तिलहन संबंधी उद्योगों में आज इतना विकास हुआ है कि इनका बाजार अन्तर्राष्ट्रीय बन गया है तथा धुनकी और ताँत से लेकर कपड़ा-मिल एवं कोल्हू से लेकर चीनी-मिल तक की विकासयात्रा गाँव से नगर बनने की कहानी है।   धरती और बीज के संबंध के ज्ञान तथा इस संबंध में मनुष्य के हस्तक्षेप अर्थात् कृषि ने ही मनुष्य को जंगल और गोष्ठ से गाँव तक पहुँचाया था और कृषि-उत्पाद संबंधी व्यवसाय और उद्योग मनुष्य को बाजार और शहर तक ले आए।   इस प्रक्रिया में प्रारंभ में गाँवों के कार्मिकवर्ग का उद्भव हुआ था, जैसे रुई धुनने की ताँत और धुनकी, सूत कातने का चरखा, कपड़ा बुनने की खड्डी, बढ़ई, लुहार तथा अन्य कारीगरों ने बनायी थी।  

 

 

 

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प्रौद्योगिकी मनुष्य और प्रकृति के संबंध का माध्यम है।   जब प्रौद्योगिकी बदलती है तब इस संबंध में भी परिवर्तन होता है।-

.. प्रौद्योगिकी की गति और दिशा

प्रौद्योगिकी की गति मनुष्य की सहज प्रवृत्तियों से जुड़ी हुई है।   जहाँ मनुष्य की जिज्ञासा-प्रवृत्ति नित नए अनुसंधान में सहायक होती है और जोतने, बोने, सींचने, फसल काटने, गहाने के नित नए उपकरणों का अविष्कार करती है, वहीं उसकी दिशा मनुष्य की लाघव-प्रवृत्ति (कम श्रम से अधिक परिणाम प्राप्त हो) के द्वारा निर्धारित होती है।   हम देखते हैं कि रहट और चरस के स्थान पर ट्यूबवैल आता है तथा हल और बैल के स्थान पर ट्रैक्टर।   दाँय चलाने का काम थ्रैसर के द्वारा होता है।   नयी प्रौद्योगिकी पुरानी प्रौद्योगिकी की समस्याओं के समाधान के रुप में आती है किंतु वह अपने साथ नयी समस्याएँ भी ले आती है; जैसे-कल किसान की समस्या थी वर्षों का होना या अकाल पड़ना, आज बिजली और तेल की समस्या है, कुओं में जल के घटते हुए स्तर की समस्या है।

.. प्रौद्योगिकी का प्रभाव

अवश्य ही प्रौद्योगिकी का निर्माण मनुष्य ही करता है परंतु वह प्रौद्योगिकी फिर मनुष्य को प्रभावित भी करती है।   नगलागढू गाँव के श्री रमनलाल कुलश्रेष्ठ ने बताया कि खेती के नए साधनों का प्रभाव यह हुआ है कि गाँव के नौजवान अब परिश्रमी नहीं रहे, वे थक जाते हैं।   प्रौद्योगिकी केवल भौतिक रुप से प्रभावित नहीं करती, मनोवैज्ञानिक रुप से भी प्रभावित करती है।   गाँव में बीस साल पहले जो मानव-संबंध थे, वे आज नहीं रहे, इसका कारण प्रौद्योगिकी है।   सासनी क्षेत्र की एक कहावत है -

           पहलें चल्त दोल सो गाँव के गाँव रहत गोल।

           फिल चली बाल्टी गामन में पर गयीं पाल्टी।

           फिल चली गए नल सो काउ नाँए काऊ के पेच की सल।

           इतना ही नहीं, मनुष्य और पशु का संबंध भी बदल गया।   'गऊ के जाये' से वह संबंध आज गाँवों में नहीं रहा।   कल तक वे किसान के वीर और कमेरे थे।   आज वह बोझ बन चुके हैं।   पहले प्रत्येक खाते-पीते किसान के पास बैलों की जोड़ी हुआ करती थी, आज सम्पन्न किसानों के पास भी बैल नहीं हैं।   आज गाँव का नौजवान नौकरी के लिए शहर की ओर चल पड़ता है, क्योंकि खेती के काम में आज मनुष्य की जगह मशीन गयी है।   कल तक हरे पेड़ काटना पाप था पर आज गाँवों के स्थान पर कालोनी बस रही हैं और पेड़ कट रहे हैं।

           जब दाँय चलाने के लिए लाँक लगाई जाती थी, तब बड़े शकुन के साथ स्याबड़ का अनुष्ठान होता था।   सन् १९७३ में लोकशास्र अंक के लिए सामग्री-संकलन के समय यह प्रथा इन पंक्तियों के लेखक ने जिंदा देखी थी पर जब आज गाँव में दोबारा उसके संबंध में पूछा तो युवक रामकिशन शर्मा को आश्चर्य हुआ परंतु साथ में बैठे एक वृद्ध किसान ने कहा है कि-'यह अनुष्ठान पहले हुआ करता था।'   कल तक गाँवों में अभाव था, पर लोगों के मन भाव-भरे थे, आज गाँवों में सम्पन्नता है पर मन में अभाव बसा है।   इसका संबंध-सूत्र प्रौद्योगिकी से जुड़ा है।   

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एक कथा है कि महर्षि चरक ने अपने शिष्यों की परीक्षा लेने के लिए उन्हें अलग-अलग दिशाओं में एक योजन (चार कोस) तक जाने के लिए कहा और निर्देश दिया कि इस बीज ऐसी कोई वनस्पति, फूल, जड़ पत्ता और घास मिल जाए जो औषधि के रुप में काम सके, उसे ले आओ।   ब्रह्मचारी विभिन्न दिशाओं में गए और उनमें से अनेक ब्रह्मचारी पोटली बाँधकर कुछ वनस्पतियों को ले आए और अनेक गठरी बाँधकर।   एक विद्यार्थी खाली हाथ लौट आया।   उस विद्यार्थी से गुरु ने पूछा-'क्या तुम्हें एक योजन तक ऐसी कोई वृक्ष-वनस्पति नहीं मिली जिसका फल, फूल, पत्ता, जड़, लकड़ी, छाल और तृण औषधि के रुप में अनुपयुक्त हो?'   विद्यार्थी ने कहा, 'गुरुदेव, ऐसी कोई वनस्पति मुझे दीखी ही नहीं जो औषधि के रुप में प्रयुक्त हो सके।'   आचार्य उसका उत्तर सुनकर प्रसन्न हुए और कहा कि तुम मेरे सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी हो।   'नास्ति मूलमनौषधम्' ऐसी कोई वनस्पति है ही नहीं,   जो किसी किसी व्याधि की चिकित्सा में उपयोगी हो।   मुख्य बात यह है कि वनस्पति के गुण और लक्षण को भील भाँति जाना-समझा गया हो तथा उचित स्थान पर उसका उचित प्रयोग किया गया हो।   यह कहना अनुचित होगा कि भारतीय आयुर्वेद का औषधितंत्र वनस्पतियों से सीधा जुड़ा हुआ है।

           हरड़, बहेड़, आँवला और पीपल को तो अमृतस्वरुप माना गया है।   गाँवों में वनस्पतियों के द्वार इलाज किया जाता है और यह परंपरा बहुत प्राचीन है।   ऐसी अनेक लोककथाएँ ग्रामजीवन में प्रचलित हैं, जिनमें ये वनस्पतियाँ स्वयं मनुष्य को स्वप्न में बतला देती हैं कि अमुक रोग की चिकित्सा अमुक फल, फूल, पत्ती, जड़ या बीज से होगी।

           'सेर सिरकटा और मूसटा' कहानी में गीदड़ 'नेकी' को उस बेल की जानकारी देता है, जिससे राजा की बेटी व्याधिमुक्त हो सकती है।   सोमलता और सोमरस देवताओं की औषधि है और सोम (चंद्रमा) औषधियों का स्वामी है, वह अमृतवर्षा करता है।   इस प्रकार वनस्पतियों को औषधियों के रुप में अमृत माना गया है। लोकगीतों में भी इस प्रकार के उल्लेख मिलते हैं-

           उठि आई मथवा में पीर
           वन कि लकड़ियाँ कोई घिस मँथवा ते लगाउ जी।
           इसी के साथ ही गाँवों में इस प्रकार की कहावतें प्रचलित हैं; जैसे-

           पकौ पान खाँसी जुकाम।
                              या
           सोंठ हर्र पीपर इसे खाकर जीपर।

           गाँवों में साधारण रोगों की चिकित्सा आज भी परंपरागत औषधियों-वनस्पतियों से की जाती है और तत्संबंधी अनुभव बड़े-बूढ़ों के पास हर घर में मिल जाते हैं, गाँव गढराना (जि. अलीगढ़) के श्री शांतिप्रकाश ने ऐसी सैकड़ों वनस्पतियों के उदाहरण दिए-

           अमरुद खाने से दस्त साफ होता है तथा दाँत के दर्द में भी अमरुद की दातुन की जाती है।   अमरबेल नेत्र रोग में भी काम आती है तथा कफ में भी।   अतिसार और संग्रहणी में आलू उपयोगी होता है।   मेहँदी की तासीर ठंडी होती है और उस पीसकर लगाने से गर्मी शांत होती है।

           नाक में फुंसी होने पर तोरई या काशीफल का फूल सूँघना चाहिए।   बबूल के पत्तों का काढ़ा 'चाँद' के 'चकत्तों' को दूर करने की औषधि है।   गले की सूजन में इमली के पानी के कुल्ले किए जाते हैं तथा 'पित्ती उछलने' पर इमली की छाल की धूनी लगायी जाती है।   बवासीर में अंडी के पत्तों का वफारा (धुआँ) लिया जाता है।

           पेट के कीड़ों को मारने के लिए आम की गुठली का सेवन करना चाहिए।   पेट के दर्द में आम की गुठली को भूनकर नमक के साथ खाया जाता है।   नक्की चलने पर अनार का फूल पीसकर दूध के साथ पिया जाता है।   बबूल की पत्ती पशु को खिलाने पर पशु अधिक दूध देता है, कान के दर्द में सुदर्शन के पत्तों का रस लाभकारी होता है।   मुँह में छाले होने पर, हाथ-पैर की सूजन में कटीली चौरैया पीस कर उसे गर्म करके लेप कर देना चाहिए।   माथे के दर्द में वनतुलसा के पत्तों का रस निकालकर उस सूँघा जाता है।   ग्वारपाठे के गूदे को रोटी में मिलाकर खाने से वायु दूर हो जाती है तथा ओंघा की जड़ के लेप से बिच्छू का काटा शांत हो जाता है।   सहजना का फूल 'अर्श' में काम आता है।

       सपंदंश की चिकित्सा में काली निरबिसी की बेल की जड़ उपयोगी है।   कहते हैं कि इसकी जड़ के आसपास साँप मिलने की आशंका रहती है।   सपं विष की चिकित्सा के लिए पीपल के डंठल कान में लगाए जाते हैं तथा सपं के द्वार काटे हुए व्यक्ति को नीम की पत्तियों से ढ्ँक दिया जाता है।

           किसी वनस्पति का जन्म पानी के सहारे होता है और कोई अपेक्षाकृत सूखी धरती में पैदा होती है।   कोई वनस्पति शीतॠतु में उपजती है तो कोई गर्मी में, कोई पहाड़ों में पैदा होती है तो कोई रेगिस्तानी क्षेत्र में, इस प्रकार विभिन्न वनस्पतियाँ प्राकृतिक प्रक्रिया की विभिन्नता की देन हैं, इसलिए उनकी 'तासीर' भी भिन्न-भिन्न है।   ब्राह्मी नामक रुखड़ी की तासीर ठंडी है और थूहड़ नाम के पौधे की तासीर गरम है।   कोई 'बादी' की (वायुवर्द्धक) है, तो कोई खाँसी (कफ) की, कोई औषधि 'पित्त' बढ़ाती है, तो कोई पित्त शांत करती है।   कोई भारी (अपाच्य) है, तो कोई हल्की (सुपाच्य)   वनस्पतियों के संबंध में इस प्रकार का ज्ञान घर-घर में बिखरा हुआ है।

           कहावत है कि 'सौ दवा और एक जंगल की हवा।'   वृक्षों के द्वारा मनुष्य को प्राणवायु मिलती है।   औषधि के रुप में नीम के कितने उपयोग हैं।   गाँवों में आँगन या चबूतरे पर नीम होना बहुत श्रेयस्कर माना जाता है।

           वनस्पतियों से चिकित्सा या उनका औषधि के रुप में प्रयोग करने की परंपरा बहुत पुरानी है तथा लोक में प्रचलित है, ये औषधियाँ हम आयुर्वेदशास्र में भी देख सकते हैं।-

           अठारह करोड़ प्रकार के वृक्ष-वनस्पतियों में से मनुष्य का परिचय कई हजार की संख्या तक सीमित है और उनमें भी शस्य सम्पदा और फल सम्पदा की श्रेणी में आनेवाले बीजों की संख्या सैकड़ों में हो सकती है और उनमें भी अनाज वर्ग में आनेवाले बीज और भी सीमित संख्या में हैं, फिर भी मनुष्य के जीवन में पहुँचने के बाद वे मनुष्य को आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार से प्रभावित करते हैं।   इसी प्रकार मनुष्य ने   बीज-वनस्पति और वृक्षों को प्रौद्योगिकी के माध्यम से प्रभावित किया है।   इस प्रकार यह प्रक्रिया उभयपक्षीय है।   अन्न मनुष्य सभ्यता का आधार है।   उत्पादन का माध्यम प्रौद्योगिकी है।   प्रौद्योगिकी में परिवर्तन मनुष्य के भौतिक और मनोवैज्ञानिक परिवेश में परिवर्तन का कारक होता है, परंतु प्रौद्योगिकी की दिशा और गति को निर्धारित करने में मनुष्य की मूलप्रवृत्तियों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है, मूलप्रवृत्तियों को मनुष्य की अंत:प्रकृति कहा जा सकता है।


संदर्भ

.       ब्रज लोक संस्कृति (डॉ. सत्येंद्र), ब्रज साहित्य मंडल, मथुरा, पृ. ४६

.       दे. परिशिष्ट .

.       वही

.       वही

.       दे. परिशिष्ट ११.

.       दे. परिशिष्ट .

 

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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