धरती और बीज

राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी

पुरोवाक्


जनपदीय अस्तित्व का आधार जीवन की अखण्डता है।   इस अखण्डता के संघटकों-आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी और वनस्पति-का सम्मिलन इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र की स्थापना में साकार हुआ।   सिंधु, गंगा, नर्मदा, महानदी और कावेरी नदियों के पत्थरों को शिल्पित किया गया।   कल्पित सरोवर में कमल पुष्पित हुआ।   प्राचीन पंचमुख वाद्य-ध्वनि कर्णगोचर हुई।   अश्वत्थ, न्यग्रोध, अशोक, अर्जुन और कदम्ब को पौधों को रोपित किया गया।   इनमें से एक-एक वृक्ष इस संस्था के एक-एक विभाग के उद्देश्य के प्रतीक एवं प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं।   जनपदसम्पदा विभाग या प्रवृत्ति का प्रेरक वृक्ष न्यग्रोध है जिसकी शाखाओं से जड़

और जड़ों से शाखाएँ प्रस्फुटित होती हैं।   अतीत-वर्तमान की यह अविच्छिन्न परम्परा लोक चिंतन-सारणि के सातत्य में अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।   यही लोकपरम्परा की अनेक अध्ययन परियोजनाओं में परिलक्षित है।   इसी माध्यम से लोकपरम्परा को समझने का प्रयास चल रहा है।   क्षेत्रसम्पदा कार्यक्रम के अन्तर्गत ब्रज क्षेत्र मुख्य है।   वहाँ के मंदिरों की संरचना, वास्तुकला एवं पूजा-पद्धति आदि पर इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र द्वारा एक पुस्तक प्रकाशित की गई हे तथा 'ब्रज क्षेत्र प्रदर्शनी' भी आयोजित की गई थी।   लोकज्ञान के स्तर पर संस्कृतियों मे सन्निकटता तो है ही, साथ ही उनमें मूल अवधारणाओं का सामान्य होना परिकल्पना से परे नहीं है।

       जिस मनीषी की यह भव्य कल्पना है और जिनकी प्ररेणा से यह अभिनव कार्य हो रहा है वे हैं इस केंद्र की आचार्या डॉक्टर कपिला वात्स्यायन।   उनकी यह आशा है कि इस पद्धति से भारतीय मानवविज्ञान, लोकविज्ञान और सांस्कृतिक अध्ययन के कई नये आयाम सत्यापित हो पायेंगे।

       इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र का लोकपरम्परा कार्यक्रम उसी कल्पना को मूर्त रुप देने तथा उन सभी सिद्धांतों के अनुसंधान, प्रलेखन और प्रकाशन संबंधी कार्यों में सतत प्रत्यनशील है।   मौखिक परम्परा की मूल अवधारणाओं के अंतर्गत हिमाचाल प्रदेश गद्दी जाति की दिक् और काल की अवधारणा, बाजरा क्षेत्रों की लोकपरम्परा, संथाल और वार्ली जनजातियों में बीज और गर्भ की अवधारणा तथा धान और केले की बंग संस्कृति जनसम्पदा विभाग की प्रमुख परियोजनाएँ हैं।   इकी श्रृंखला में डॉक्टर राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी ने ब्रज क्षेत्र के किसानों में धरती और बीज की अवधारणा का अध्ययन किया है जो विशेष महत्त्व रखता है।   मुझे प्रसन्नता है कि लोकपरम्परा की श्रृंखला में यह शोध प्रबंध हिंदी में प्रस्तुत किया गया है।

       डॉक्टर राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी ने धरती और बीज संबंधी भौतिक, मनोवैज्ञानिक, सौंदर्यबोध, अभिव्यक्ति, चिंतन और विश्वास प्रणाली के अनेक विशिष्ट पक्षों का अन्वेषण किया है।   लोकपरम्परानुसार बीज और फल की पहचान कर्म-परिणाम क्रम में है।   उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, बंगाल, तमिलनाडु और भारत के लगभग सभी भागों में प्रचलित नवरात्र उत्सव में बीज की ढेरी पर मंगल घट की स्थापना और मिट्टी के कलश में बीज वपन की परम्परा उर्वरता और परिपूर्णता का प्रतीक है। किसी भी बीज का अंकुरण एवं संवर्धन धरती की उर्वरा शक्ति पर निर्भर करता है और उर्वरा शक्ति, मेघ, जल, ॠतु-चक्र अनंतकाल की गति से अभिन्न है।   वस्तुत: धरती और बीज का यह संबंध सृष्टि की सम्पूर्ण प्रक्रिया में समाविष्ट है।

       एकमात्र धरती का गर्भ सम्स्त प्रकार के जीवन को धारण करता है।   धरती उनके भरण-पोषण का स्रोत तथा जीवन-क्रिया का मंच बन जाती है और फिर लीला पूर्ण हो जाने पर अपनी गोद में समेट भी लेती है।   इसी सूत्र में विविध जीवन-पद्धतियाँ एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं।   वनस्पति जगत का स्थूल बीज जैविक प्राणियों में वीर्य, शुक्र, तथा तत्त्वज्ञान में हिरण्यगर्भ है।   बीज से सृष्टि, रुप, स्वरुप की उत्पत्ति हुई, और इसी

में इसकी विलीनता भी नीहित है। जीवन-प्रक्रिया में पारस्परिक सामंजस्य या समन्वय का संदेश मानवजीवन की रचनात्मक मन:शक्ति में सुस्पष्ट है।   लोककथाएँ, शिल्प, नृत्य, गीत-वाद्य, नाटक आदि इस सिद्धांत की पुष्टि करते हैं।   वैविध्य और अखण्डता से जुड़ी हुई यह एक से अनेक, अव्यक्त से व्यक्त, सूक्ष्म से विशाल और निर्गुण से सगुण होने की क्षमता और प्रवृत्ति के रुपांतरण का विचार प्रकृति में प्रत्यक्ष है तथा मानवजीवन में भी।

       जिज्ञासु और उत्सुक मानव मन में धरती और बीज को अटूट संबंध को देखा और प्रत्येक परिप्रेक्ष्य में उसे पहचाना।   ॠतु और काल चक्र को गाँव में बसे लोगों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति, विश्वास और बोली से सँजो लिया।   प्रकृति में अंकुरण, पल्लवन, फूल और फल बनने की क्रियाओं को उन लोगों ने कभी गीत में, कभी नृत्य में, कभी लोकोक्ति में एवं कथा में व्यक्त किया है।   लोकमानस के अनेक आवृत्त चिह्मों, संकेताक्षरों के अतिरिक्त लेखक ने वनस्पति-शास्र से संबंधित ज्ञान-विज्ञान का अन्वेषण किया है।   प्रकृति के आँगन में पड़े बीज की जीवन-यात्रा का प्रतिबिम्ब वन-उपवन तथा कृषि सम्पदा के अधिकारियों के अपने आवरण, अर्थव्यवस्था, व्यवहार, तीज-त्यौहार और भाषा में परिलक्षित होता है। यही अंतर्धारा लोकसाहित्य, लोकवार्ता एवं अभिव्यक्ति या दर्शन के साथ-साथ खान-पान के अतिरिक्त देशज प्रौद्योगिकी में भी प्रत्यक्ष और कभी परोक्ष रुप से प्रवाहित होती है।

       इस संदर्भ में लोक और शास्र के बहुचर्चित वर्गीकरण का विषय उठना भी स्वाभाविक है और अनिवार्य भी।   शास्रीय बौद्धिक प्रणाली को जनसाधारण अपने ही ढंग से प्रतिपादित कर प्रयोग में लाता है और इसी से उसका चिंतन, दर्शन और विश्वबोध प्रभावित होता है।   इस स्तर पर शास्र और लोक एक-दूसरे के पूरक हैं।   लेखक ने शास्र और लोक के पक्षों और उनके शाश्वत प्रवाह को बड़ी कुशलता से सामने रखने का प्रयास किया है।   इस नवीन दृष्टिकोण से लोकमानस के अध्ययन में नई दिशा के संकेत मिलते हैं।

       लोकज्ञान की यह सम्पदा आनेवाली पीढियों की धरोहर है।   चतुर्वेदी जी ने अत्यंत परिश्रम एवं अव्यवधान के साथ इस स्मपत्ति को एकत्र कर प्रस्तुत ग्रंथ में सुरक्षित कर दिया है।   अथक परिश्रम एवं सारस्वत-साधना के फलस्वरुप, निखिल सम्पदा के ये बीज, दूर-दूर पहुँचकर अंकुरित एवं पुष्पित हों, यही मेरी कामना है।  

       इस परियोजना के संचालन और पुस्तक के सम्पादन में सहर्ष सहयोग के लिए मैं डॉक्टर नीता माथुर का आभारी हूँ।

 

          -बैद्यनाथ सरस्वती

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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