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मौखिक महाकाव्य

सम्पादक : मनोज कुमार मिश्र

2001, ix+145pp., ISBN: 81-246-0176-3, Rs. 260 (HB)



यह प्रकाशन क्षेत्रीय मौखिक महाकाव्य से संबन्धित 6 लेखों का संग्रह है जो कथावाचन एवं कथावाचक – एक्सप्लेनिंग इंडियाज चैन्टेड नैरेटिव्य विषय पर आधारित एक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में प्रस्तुत किए गए थे। इन महाकाव्यों के अंतर्गत मौखिक परम्परा में क्षेत्र व जाति विशेष से जुड़ी ऐतिहासिक व अनैतिहासिक कथाओं का एक विशाल सागर है जिसमें महान् चरित्र, महान् मूल्य एवं महान् आदर्श को प्रतिबिम्बित करने वाले विभिन्न चरित्रों की परिकल्पना है। लोक-ज्ञान से पूरित इन प्रचलित लोक कथाओं का बदलता स्वरूप निश्चित रूप से समाज में हो रहे परिवर्तन से संबंधित है। मौखिक और लिखित साहित्य तथा इनके संबंध के विषय में हमारे मन में उठने वाले विभिन्न प्रश्नों का मंथन और उससे निकलने वाले रत्नों से युक्त इन लेखों के अध्ययन के पश्चात् यह ज्ञात होता है कि विभिन्न लोक-ज्ञान, लोक परम्पराओं व लोकानुरंजन से जुड़े ये महाकाव्य समाज को कैसी दिशा देते हैं? एक सामान्य व्यक्ति में किस प्रकार की अद्भुत शक्ति होती है? और ये वीरता, भक्ति से किस प्रकार जोड़ते हैं? देश के विभिन्न अंचलों से संग्रहीत इन मौखिक व गेय महाकाव्यों में वहाँ की संस्कृति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। इन सबसे बढ़कर इनमें कहीं न कहीं एक अद्भुत समानता है जो आंतरिक रूप से इन्हें परस्पर जोड़ती है।
 

 


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