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  बनारसीदास चतुर्वेदी के चुनिंदा पत्र
सम्पादक – नारायणदत्त

 

2006, (in 2 vols.), 607pp. (vol I), 508 (vol. 2), ISBN: 81-267-1109-4 (Vol. I), 81-267-1110-8 (vol. 2), Rs. 650 (vol. I), Rs. 550 (vol. 2)


 


बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में नए हिन्दी समाज के निर्माण में साहित्य की भूमिका इतनी निर्णायक थी कि तब के हमारे सभी महत्त्वपूर्ण साहित्यकार नए समाज के निर्माता के रूप में भी जाने जाते हैं। बनारसीदास चतुर्वेदी भी उन्हीं में से एक थे। हिन्दी की जातीय संस्कृति तथा मनीषा के विकास के लिए उन्होंने सबसे अलग और मौलिक राह चुनी थी। पत्रकारिता तथा वैचारिक लेखन में उल्लेखनीय जगह बना चुके चतुर्वेदीजी ने पत्रों के माध्यम से हिन्दी समाज को जोड़ने और इसकी आंतरिक जड़ता को तोड़ने का काम किया। उन्होंने अपने लम्बे जीवनकाल में हजारों लोगों को पत्र लिखे। उनमें अपने समय के प्रतिष्ठित लेखक और जननायक ही नहीं, वैसे सामान्य जिज्ञासु पाठक और कार्यकर्त्ता भी थे जो समय तथा समाज की चिन्ताओं से गहरे जुड़े थे।

चतुर्वेदीजी ने पत्रों को सृजनात्मक और कलात्मक ही नहीं बनाया, इसके माध्यम से ही इसकी उपादेयता को रेखांकित भी किया और एक स्वतंत्र विधा के रूप में प्रतिष्ठा दिलवाई।

उनका पत्रलेखन असाधारण रूप से व्यापक और वैविध्यपूर्ण था। वह उनकी दिनचर्या का अंग बन गया था। उनके द्वारा लिखे गए पत्रों की संख्या एक लाख से भी अधिक हो सकती है। अधिकांश पत्र हिन्दी में लिखे गए हैं, मगर अंग्रेजी पत्रों की संख्या भी कुछ कम नहीं है। कुछ पत्रों में मिली-जुली भाषा का भी प्रयोग हुआ है।

चतुर्वेदीजी के सभी पत्रों को ढूँढ़ निकालना तो सम्भव नहीं था, लेकिन नारायणदत्त जी ने वर्षों के परिश्रम के बाद अधिकांश महत्त्वपूर्ण पत्रों को संकलिक किया है, जिन्हें दो ज़िल्दों में प्रस्तुत किया जा रहा है। ये महज़ एक साहित्कार-पत्रकार के पत्र नहीं है, बल्कि पिछली सदी के हिन्दी समाज के चिन्तन, वैचारिक संघर्ष और संस्कृति के जीवंत दस्तावेज़ हैं।
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