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चौदैयादानापुर में मुक्तेश्वर का मंदिर

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सज्जा के नमूने

 

उत्तरी प्रांगण, उपपिठा, प्रथम और वित्तीय कुरसी, सज्जा के नमूने, हंस और लताएं 1

एक वनस्पति लता गोलाकार चलती है और छोटी से गोलाकार में समाप्त होती है। घेरे के अंदर तीन फूल, कलियों के रूप में, दो मुड़ी हुई छोटी लताओं के बीच होती है। एक घेरे से दूसरी लता निकलती है जो उसी प्रकार से दूसरे घेरे में जाती है। घेरे के अंदर फूल की कलियां वैकल्पिक रूप से ऊपर और नीचे तक होती हैं। यह नमूना मुड़ी हुई बेल-बूटे के रूप में समाप्त होता है।

यह नमूना आधार अथवा उपपिठा के निचली कुरसी (जगती) पर दिखाया गया है।

उत्तरी अहाता, उपपीठा ऊपरी भाग, लता 2, फूलों की श्रृंखला और सिंह मुखाकृति

यह लता 1 के समान नमूना है, परंतु इसका आकार छोटा है, इसलिए घेरे के अंदर केवल एक फूल की कली के लिए स्थान है।

कपोत के निचले स्तर पर क्षैतिज बंध पर आधार के शीर्ष अथवा उपपीठा पर समान आकार का बंध दिखाई देता है।

उत्तरी अहाता, आधीस्थान, लता 3 और सिंह का दहाड़ता रूप और मुखाकृति

क्षैतिज बंध के साथ चलती घुमावदार लता से निकलती वनस्पति की लताएं जिनमें से अधिकांश मुड़े हुए आकार की होती है।

यह सर्वाधिक ऊपरी बंध पर दिखाई देता है, अक्सर इसे दीवार के आधार या अधिस्थान का प्राति कहा जाता है।

पश्चिमी अहाता, मध्य मोड़ के दक्षिण में सज्जा के नमूने, लता 4

लता 1 के समान, परंतु घेरे की ऊर्ध्वाधर श्रृंखला में एक वनस्पति लता अपना घेरा एक छोटे गोले के रूप में बनाती है जिससे एक और लता निकलती है जो एक ही आकार के और इसी प्रकार के नए घेरे बनाती है। घेरे के अंदर विविध प्रकार के नमूने हैं: बारह पंखुड़ियों के साथ एक खुला फूल; घुमाव के बीच फूलों की तीन कलियां; जो वैकल्पिक रूप से विपरीत अवस्थिति में हैं; घुमावदार आकार के अन्य वनस्पति नमूने, जो श्रृंखला या गुच्छे में व्यवस्थित हैं; एक मामले में उड़ती हुई मानव आकृति है, उर्ध्वाधर क्रम के तल में लताओं का समूह है जो अर्द्ध गोलाकार में एकत्र है जिसके बीच से पहला गोलाकार निकलता है; शीर्ष वनस्पति के घुमावदार समूह बनाते हैं।

यह दीवारों पर, बाहरी सिरे पर प्रत्येक ओर पतले भित्ति-स्तंभ के बीच दोनों स्थानों पर पाया जाता है।

प्रथम विशाल संरचना के आकृति शिखर में बाहरी नासिका के प्रत्येक ओर अपसर्पण बंध पर नमूने का एक स्वरूप दिखाई देता है।

यह नमूना और दीवार पर इसकी स्थिति बहुत दुर्लभ विशेषता है।

यह छोटे-योजनाबद्ध खुले फूलों की श्रृंखला है, जिसमें समचतुर्भुज में चार पंखुड़ियां हैं, जो वैकल्पिक रूप में मोतियों के छोटे गोलाकारों से युक्त हैं।

यह पत्थर की मूर्तियों में आभूषण के नमूने की सच्ची अनुकृति है। उपपीठा आधार पर कुमुद नामक तिरछे बंध के छोरों पर दिखाई देता है। दरवाजों की सज्जा में इसका बहुत व्यापक स्वरूप मिलता है।

हंस सफेद रंग के हिमालय में मानसरोवर से प्रवास करने और कमल के तनों पर पलने वाले एक जलीय पक्षी की काव्यात्मक संकल्पना है। इसमें दूध और पानी के मिश्रण में से दूध को निकालने की दक्षता होती है। इसलिए यह उस संत की तुलना का मानक है जो इस दुनिया की वास्तविकता और परम सत्य के बीच अंतर कर सकता है। इसकी छवि स्मारकों, वस्तुओं, आभूषणों आदी कि सज्जा में एक लोकप्रिय अलंकार है।

दक्षिण भारतीय मध्ययुगीन मूर्तिकला में इसका रूप काफी कल्पनाशील है। इसे छोटी गर्दन, गोल सिर और बहुत महीन रूप से मुड़ी हुई लंबी चपटी चोंच के साथ बत्तख का आकार दिया गया है। अक्सर इसे जीवनवृत्त, चलने की क्रिया में क पैर ऊपर किए हुए दर्शाया गया है। इसकी चोंच से कमल का तना कली के समान लटकता है, इसका शरीर बहुत छोटा है। इसकी प्रतिपूर्ति एक लंबी पूंछ से होती है जो वस्तुतः घुमावदार वनस्पति नमूनों की आकृति में दर्शाई गई है।

यह मंदिर के आधार पर जगती नामक दूसरी कुरसी के चारों ओर चलती हुई दिखाई देती है।

इस जंतु की अधिकांश मुखाकृति सिंह जैसी है, जिसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दर्शाया गया है। सिर में बहुत बड़ा मुंह है जिससे दो ऊपरी नुकीले दांत बाहर आ रहे हैं, जिससे फूले मसूड़े गेंद के रूप में मुंह से बाहर आते दिखाई देते हैं। गोल आंखें अपने स्थान से बाहर आ रही हैं और बहुत बड़ी हो गई हैं, दो तीखे उठे हुए, अधिकतर मवेशियों वाले कान हैं और मुड़े हुए शीर्ष वाले दो बड़े सींग हैं। बाकी का शरीर बहुत वास्तविक है, हालांकि यह सिर की तुलना में छोटा प्रतीत होता है, परंतु इसमें केसर, शरीर, पंजे और सिंह की पूंछ है।

संस्कृत में इसका सामान्य नाम सिंह है।

यह विविध रूपों में दिखता है। आधी स्थान अथवा दीवार आधार के प्रथम तल में सुसज्जित कड़ियों के अंत में सज्जा के लिए दहाड़ते सिंह की पूर्ण आकृति आरक्षित है। यह वृत्त सामान्यतः दर्शाया जाता है। केवल कड़ियों में मध्यावर्ती स्थिति में मुखाकृति दी जाती है। आकृति वाले कोनों के मामले में कड़ी का अंतिम सिरा प्रवणित होता है और मिलने वाले दो सिरों पर दक्षतापूर्वक वृत्त को उकेरा गया है, बाकी छोरों पर भी अग्र रूप प्राप्त किया जा सके।

दरवाजों के बंध पर चित्रवल्लरी के भी इस नमूने का प्रयोग किया गया है।

पूर्व में वर्णित सिंह के शीर्ष को सिंहलता (अथवा सिंहमुखा आदि) कहा जाता है, जिसे पृथक रूप में प्रयोग किया जाता है और अधिकांशतः न केवल ऊपरी जबड़े के ऊपर ऊपरी हिस्से के साथ समान अतिस्योक्ति अथवा काल्पनिक रूप में किया जाता है। इसमें बड़ा मुंह व्यापक रूप से खुला है और विभिन्न प्रकार के बेल-बूटे बाहर आते प्रतीत होते हैं।

ये विविध आकारों में कमोबेश विवरण के व्यापक तरीके से विभिन्न स्थानों में दिखाई देते हैं। ये बाहरी परछत्ती खिड़कियों के सिरों और त्रिअंकी-सिरों (नासिका) का आम अलंकरण है जो आधार (उपपीठा) के घुमावदार ओलती जैसे छोटे आकार में पाए जाते हैं, ये बड़ी संरचना के तीन स्तरों में गुंबद की छत (शिखर) में मध्यम आकार के होते हैं जो पूरे स्मारक और टावर के चारों ओर होते हैं, टावर के ये बाहरी सज्जा संरचना पर बड़े आकार के होते हैं। इनमें से सबसे बड़ा और भव्य सुकानासी वृहत संरचना के पूर्वी दिशा में है। भित्ति स्तंभों के बीच दीवारों पर कई कोष्ठक स्थानों के बीच वास्तुकला के स्तंभ-वृहत संरचना नमूनों के ऊपर उकेरे गए गुबंद-सज्जा  के शीर्ष पर एक अन्य सुंदर रूप दिखाई देता है।

मुंह से एक बड़ा बेल-बूटा निकलता है और दोनों दिशाओं में बढ़ता है। ये गुंबद का ऊपरी हिस्सा बनाता है। बेल-बूटे का डिजाइन बहुत काल्पनिक है, परंतु यह नमूना अक्सर दिखाई देता है, ये एक प्रकार के वनस्पति प्लेटों से बना है जिसमें हर ओर से घुमावदार मोड़ हैं।

यह एक काल्पनिक पशु है जो विभिन्न प्रजातियों के अंगों को साथ मिलाकर बना है। ये अंग वास्तविक हो सकते हैं, परंतु इनका संघटन काल्पनिक है।

इसका शरीर डॉल्फिन या शिंशुक जैसा दिखता है। इसका सिर थोड़ा शिंशुक जैसा है, परंतु नीचे का जबड़ा मगरमच्छ के समान है, ऊपरी जबड़ा लंबे सूंड़ के रूप में लंबवत है, जो केवल हाथी की सूंड़ हो सकती है, इसकी पूंछ वनस्पति नमूनों की बनी है, जो हंस के रूप में दी गी है। अंत में पंचों के साथ पैर हैं जो सिंह का स्मरण कराते हैं। फिर भी पूरी प्रतिभा काफी सौंदर्यपूर्ण है और इसे भारतीय मूर्तिकला की उत्तम रचना कहा जा सकता है। कौडादानापुरा के मूर्तिकार ने नमूनों का बहुत वैभवपूर्ण चित्रण कर उपलब्धि प्राप्त की है।

उसने इसे गुंबद के आधार के लिए प्रयोग किया है जो मंदिर की सभी दीवारों पर स्तंभ-वृहत संरचना वास्तुकला नमूनों को शामिल करता है। उसने इस गुंबद के सहयोग के लिए बनाया है। गुबंद भी इतना ही काल्पनिक है। ये लगभग पूर्ण गोलाकार में उकेरी गई दो बड़ी लताओं के वृहत स्थान से बना है और जो लटकती हुई पुष्पकली के साथ समाप्त होता है। सिंह मुखाकृति के मुंह से निकलता बेल-बूटे के नमूने को तीसरी लता जोड़ती है। पहली लता मगरमच्छ के खुले हुए बड़े मुंह से निकलती है।

इस नमूने को मकर कहते हैं। आम तौर पर संस्कृत शब्द का अर्थ मगरमच्छ है। यहां इसे मिश्रित पशु पर लागू किया गया है। मकर प्रेम के देवता काम का वाहन है, इस देव के चित्रण में इसे समान रूप में दर्शाया गया है। ये दर्शाता है कि इस नमूने की केवल अद्भुत पशु के रूप में संकल्पना नहीं की गई है, बावजूद इसके कि इसे अद्भुत पशुओं के अंगों से बनाया गया है। यह राक्षस नहीं है जिसे डर या नफरत पैदा करने के लिए नहीं बनाया गया है। इसे सम्मानजनक पशु के रूप में कल्पित किया गया है।

पूर्वी द्वार, दायां दरवाजा, पूर्वी प्रांगण, प्रथम बंध आभूषण श्रृंखला, दूसरी बंध लता 1क, चौथी लता 6

यह दो प्रकार के घटकों, बेलदार सिरे के साथ चार पंखुड़ियों का खिला पुष्प, चतुर्भुज सिरे में चार पंखुड़ी के छोटे फूल के साथ वैकल्पिक रूप से मोतीदार सिरों में गढ़े गए चतुर्भुज अमूल्य पत्थरों से जड़े चित्रण की श्रृंखला है। ये बेल बंध के जितनी चौड़ी है जिस पर इसे उकेरा गया है, चतुर्भुज काफी छोटा है। इन दो घटकों द्वारा छोड़े गए स्थानों में वनस्पति बेलों के नमूने गढ़े गए हैं जो दोनों और फूलों की पंखुड़ियों से बने हैं, ताकि कोई स्थान खाली न रहे।

ये नमूना उपपीठा के कुमुद पर पुष्प श्रृंखला के समान है, परंतु बड़े आकार का होने से ये काफी बड़ा है।

इसे दरवाजे के प्रथम बंध पर बाहरी मुख पर दर्शाया गया है। ये दक्षिण और पूर्व के प्रांगण में सभी दरवाजों पर मिलता है।

यह लता 1 का नमूना है, परंतु दरवाजे के दूसरे बंध के कोण पर उकेरा गया है, ताकि गोलाकार को आदा हिस्सा बाहरी मुख पर, आधा लम्बकोणीय मुख पर दर्शाया जा सके। केंद्रीय पुष्प को सिरों पर और बाहरी पुष्पों को विभिन्न मुखों पर दर्शाया गया है।

इसे दरवाजों के दूसरे बंध पर बाहरी हिस्से में दर्शाया गया है। ये दक्षिण और पश्चिम प्रांगण में सभी दरवाजों पर मिलता है।

तीसरी बंध लता 5

यह लता 1 की चित्रवल्लरी का घटक है, इसे इस बात से अलग किया जा सकता है कि यह एकल चित्रण है साथ ही बड़े आकार ने मूर्तिकार को ज्यादा व्यापक रूप में ब्यौरे देने की अनुमति दी। गोलाकार के अंदर छह फूल और बड़ी संख्या में वनस्पति बेल-बूटे हैं।

ये नमूना सभी दरवाजों में द्वारपालक के शीर्ष पर गुंबद के ऊपर तीसरे बंध में भित्ति चित्रों के आधार पर मिलता है।

उत्तरी प्रांगण, सिंह के सिर का नमूना, मकर और पंजारा के ऊपर गुंबद

यह लता 1 के समूह के समान वनस्पति नमूने की चित्रवल्लरी है, परंतु अपने छोटे आकार के कारण ज्यादा सरल है। चलती लताओं द्वारा बने गोलाकारों में केवल एक पुष्प है और गोलाकारों के बीच खुले स्थानों में केवल एक मुड़ी हुई लता है।

दरवाजों के दो भित्ति चित्रों के बीच स्थान में इस नमूने का प्रयोग किया जाता है।

रंगमंडप, उत्तरी प्रांगण, केंद्रीय आले, दरवाजे का नमूना, छठा बंध, दहाड़ता सिंह।

यह दहाड़ते सिंह के विभिन्न रूपों का एक प्रकार है जैसा चित्र में शरीर दर्शाया गया है, परंतु सिंह अपना शीर्ष घुमाता है, ताकि आयाल सहित उसका मुख और उसके उठे हुए अगले दो पैर देखे जा सकें।

उसके पिछले पैर वनस्पति नमूने पर टिके हैं।

यह चित्रवल्लरी दरवाजों पर दूसरे भित्ति-चित्र के बीच के स्थान तथा रंगमंडप की दीवार पर स्थान को भरती है जिसमें दरवाजों की चौखट घुसाई जाती है।

ऐसा ही सिंह, इसी मुद्रा में, बड़े आकार में, ज्यादा व्यापक ब्यौरों के साथ, रंगमंडप की दीवार पर, इसकी उत्तरी दिशा में तीन प्रतीकात्मक विमान टावरों के बीच, केंद्रीय आले के ऊपर दर्शाया गया है, दो मामलों में सिंह को पिछले पैरों पर खड़ा दर्शाया है, अगले दो पैर उठे हुए, चलने या नृत्य करने की मुद्रा में हैं।

दक्षिण द्वारा, दरवाजा, दक्षिण प्रांगण, सातवां बंध, पुष्प की पंखुड़ीयां।

पद्मा नामक दोहरी घुमाव वाली आकृति अक्सर पुष्प की पंखुड़ी के डिजाइन से सुसज्जित की जाती है। इस पंखुड़ी को वनस्पति की मुड़ी हुई बेलों के डिजाइन से ही सजाया जाता है। जिस दीवार में चौखट घुसाई जाती है उसका किनारा खांचेदार होता है। ये खांचा, दो सेंटीमीटर गहरा है, इसे पदम आकार या दोहरे घुमाव वाली आकृति में काटा गया है। मूर्तिकार ने इस स्थान को पंखुड़ी के नमूने के लिए चुना। इस पंखुड़ी की वनस्पति सज्जा एक पंखुड़ी से दूसरी पंखुड़ी में अलग है।

 

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