परिव्राजक की डायरी

अजय नदी


वर्षों पहले की बात है । घटना के सामान्य होने पर भी उस समय उसने हमारे मन पर एक अमिट छाप छोड़ दी थी और चूँकि यह केवल हमारे जीवन में ही घटा था, अत: मैंने इसे कहीं लिखकर भी नहीं रखा । दो-एक लोगों को छोड़कर मैंने यह बात किसी को भी नहीं बताई ।

        जीवन में ऐसी कितनी ही घटनाएँ घट चुकी हैं जिनके लिए हमारी ओर से पहले ही सावधान होने पर अच्छा होता, परन्तु अपने स्वभाव के दोष के कारण मैं ऐसा नहीं कर सका । इसी के फलस्वरुप मैंने बाहरी जगत् से चोट खाई, तथापि मन को यह समझाकर तृप्त हो गया कि अपने सत्य को तो मैंने पराजित नहीं होने दिया, परन्तु होने से भी क्या होता । दु:ख तो आघात देकर चला जाता है और हर समय उसे दूर करने जैसी स्थिति भी तो नहीं होती, इसीलिए थोडी शांति के लिए बीच-बीच में किसी भी एकान्त स्थान पर जाकर मैं अपने साथ खुले भाव से आत्ममंथन कर लेता हूँ ।

        ऐसे ही एक दिन की घटना है । तब वर्षा का समय था । सावन का महीना अपने यौवन पर था । विभिन्न प्रकार की घटनाओं से चोट खाकर मैं उस दिन अजय नदी के किनारे भागकर चला आया । चारों ओर शर के वन से भरे इस स्थान पर बीच-बीच में दो एक बबूल के पेड़ और नीचे गेरुआ रंग की फेनिल नदी कल-कल करते हुए बह रही थी । उस तरफ़ घास और शरों के वन, दूर में एक सूने गाँव की टूटी-फूटी अट्टालिका दिखाई दे रही थी । आम और कटहल के पुराने घने बगीचों को पार करते हुए उसका शिखर उठा हुआ दिखाई दे रहा था । उस सूने गाँव के निवासी नदी के उस पार और भी कुछ दूरी पर बस गये थे और वहीं उन्होंने अपनी झोंपड़ी बना ली थी । उनकी छोटी झोंपड़ियाँ और नीबू के खेत दूर से ही दिख रहे थे ।

        बैठे-बैठे अपनी ही बात सोचने लगा । उनकी बात, जिन्होंने हमें दु:ख दिया है । मन के भीतर से उनके विरुद्ध सारा क्रोध, सारे विद्वेष को दूर करने का प्रयास कर रहा था, परन्तु किसी भी तरह से मानों यह सम्भव नहीं हो रहा था । चारों ओर ऐसी मूढ़ता, ऐसा स्वार्थ और अहंकार का ज़ोर है कि उसकी ज्वाला से हृदय भाराक्रांत और पीड़ित लग रहा था । इसी समय हमारी दृष्टि एक साधारण बबूल वृक्ष की एक डाल की ओर पड़ी । इसकी छोटी डाल छोटी-छोटी पत्तियों के द्वारा नदी के जल को मानों निमंत्रण देने के लिए नीचे की ओर झुक गई है । वास्तव में क्या हुआ, यह मैं नहीं बता सकता, परन्तु अचानक यह सामान्य दृश्य देखकर मेरी दोनों आँखें आँसुओं से भर गई । बबूल के इस सामान्य से पत्ते में इतना सौन्दर्य होता है, यह मैंने कभी नहीं सोचा था । मेरी सारा अंत:करण उसके रुप से भर गया । नीचे नदी, उस पार बालू का मैदान, शरों का वन और दूर घनी हरी वन पंक्तियाँ सभी मानों इस तरण पल्लव के मंत्रस्पर्श से संजीवित हो उठे हों । मैं फिर उस तरफ़ से नज़र नहीं हटा सका । मैं

बाहर की समस्त प्रकृति की ओर नहीं देख रहा था परन्तु मेरे शरीर के रंध्रों में उसकी उपस्थिति का अनुभव हो रहा था । मेरे मन में हुआ कि समस्त विश्व-प्रकृति आज लहरों का आकार धारण करके मुझे डुबाने के लिए आ रही है । तूफ़ान आने पर जैसा शब्द होता है, मेरे कानों में वैसे ही शब्द बह-बहकर आने लगे और थोड़ी देर के लिए खेत, घाट, नदी, वृक्ष श्रेणी ऐसे ही ये छोटे पत्ते तक अपार सौन्दर्यपूर्ण तरंग का रुप धारण करके मुझे डुबाते रहे । परन्तु जब मुझे होश आया तो क्षमा और प्रेम मेरे अंत:करण में भर गया था । संसार में किसी से भी मुझे कोई शिकायत नहीं थी । जिस मिट्टी पर मैं बैठा था, वह अपनी होते हुए भी और अपनी हो गयी । गाढ़े प्रेम से भरकर मैंने उसे चूम लिया ।

        यही उस दिन की घटना है । घटना भी क्या थी, एक वृक्ष के साधारण से पत्ते के सौन्दर्य से मैं थोड़ी देर के लिए अभिभूत हो गया, यही बात नहीं थी । जो भी हो, इसके बाद कितने ही दिनों तक मैं मानों एक अश्रुस्रोत के आनन्दलोक में विचरण करता रहा । मुझमें किसी के भी प्रति कोई द्वेष नहीं रहा । जिन्हें पहले मैंने विरोधी समझा था, मन में उन्हें घृणा की दृष्टि से देखता था, उन्हें मैं आज पूरी तरह से क्षमा करके हृदय से लगा सकता हूँ, मन में यही होने लगा । परन्तु इस तरह से बहुत दिन नहीं चला । कई दिनों के बाद धीरे-धीरे मन में आया कि अपने प्रेम के द्वारा विश्व को तो विजित नहीं कर सका । वे लोग जैसे अंधे थे, वैसे ही रह गये । उनके आलस्य के भय और अवसाद के पहाड़ को तो मैं तनिक भी नहीं हटा सकता । तब अजय नदी के किनारे सौन्दर्य की अनुभूति का क्षण हमारे लिए विलास का मुहूर्त हो गया हे, मुझे ऐसा लगने लगा । मन में प्रश्न उठ - अच्छा, इस मुहूर्त पर मुझे ऐसी क्या नई वस्तु मिल गई, जिसके लिए उस अनुभूति की पुनरावृति की आकांक्षा करता हूँ । मैंने सोचकर देखा - मुझे नया कुछ नहीं मिला है । विश्व भर के मानव एक हैं, मैंने अपनी बुद्धि से इससे पहले यही अनुभव किया था । अपने कर्म में मैं बराबर यह लाने की चेष्टा करता था, किन्तु बाहर के अंधकार में संग्राम के बीच हृदय में यह विश्वास शायद प्रतिष्ठित नहीं हो पाता था । किन्तु इससे हमारी दृष्टि में ऐसा क्या विस्तार हुआ था या मुझे कोई नया ज्ञान मिल गया था ? नहीं तो उस दिन की अनुभूति से विशेषकर एक ऐसी भाव-प्रवणता की सृष्टि हुई थी, जिसने हमारे कर्म की शक्ति को न बढ़ाकर गोपनीय विलास के एक रास्ते का पर्दाफ़ाश कर दिया था । शायद इसीलिए उस रास्ते पर मुझे पुन: जाने की इच्छा नहीं होती ।

        परन्तु ऐसा करके आज मैं सौन्दर्य के आकर्षण को भूल गया हूँ, ऐसी बात नहीं है । हिमालय की गोद में खड़े होकर मैंने देखा है-पर्वत श्रृंखला धूसर से काली, काली से नीली और अंत में नीली से बादलों के झुंड के रुप में आकार धारण करके खड़ी है । कहाँ उसका आरम्भ है, मेघलोक कहाँ समाप्त होता है, सब मानों एकाकार हो गये हैं । उसके रुप की तुलना नहीं की जा सकती । उस रुप से थोड़ी देर के लिए मैंने हृदय में कहीं जैसे एक गुप्त भाव का अनुभव किया है, किन्तु वह अजय नदी के समान कभी भी मुझे आवृत या मोहग्रस्त नहीं कर पाया

        हिमालय को देखकर मुझे अंदर से बल मिला है । मेरे मन में हुआ कि यह मानों हमारे युद्धाक्रांत मित्र के जीवन की प्रतिच्छवि है ? जीवन में जो सारे उतार-चढ़ाव आये, पर्वत का यह विस्तृत रुप मानों उसी का साक्षी है । विश्वास का विषय केवल यही है कि जीवन-संग्राम के बीच गहन वनों से आच्छादित घाटी में मैं जब रास्ता भटक जाता हूँ तो हिमालय के बीच काले पर्वत श्रेणी के उस पार जो अनन्त ऐश्वर्ययुक्त ओस का जय-मुकुट रहता है, उसकी बात स्मृति-मार्ग में आ जाती है और वह हमारे अंतर में आशा और सहिष्णुता लौटा लाती है ।

        जीवन-संग्राम के प्रत्येक फ़ासले पर मनुष्य इससे अधिक और क्या आशा कर सकता है ?

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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प्रकाशक : इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र सेंट्रल विस्टा मेस, जनपथ, नयी दिल्ली - ११० ००१ के सहयोग से वाणी प्रकाशन २१-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - ११० ००२ द्वारा प्रकाशित