परिव्राजक की डायरी

बुण्डू


कितनी दुष्ट लड़की है यह बुण्डू ! एक दिन मैं उसे रिक्शे पर चढ़कर गंगा के किनारे घुमाने ले गया । वहाँ वह मेरी अँगुली पकड़कर छोटे-छोटे पाँवों को फेंकते हुए सैर करने लगी । सामने थोड़ा कीचड़ देखकर मैंने उसे गोद में उठा लिया । इसी तरह से घर में भी कुछ मुश्किल पड़ने पर उसे गोद में उठाने पड़ता है । उस दिन मैं घर में बैठकर पढ़ रहा था । नीचे सीढ़ी में उसने चिल्लाने शुरु कर दिया । बड़े भैया कहाँ हो, कहाँ हो, (मतलब कि उसे गोद में चढ़ना था ), पैर में कीचड़ लग जायेगा । वास्तव में घर में किसी भी तरफ़ कहीं भी कोई कीचड़ नहीं था । सारी ईंटें, लकड़ियाँ और सीमेण्ट थे, फिर भी बुण्डू के हुक्म से नीचे उतरकर उसे गोद में उठाकर हमारे पढ़ने वाले कमरे में लाना पड़ा ।

        और पढ़ने वाले कमरे में ही क्या उसके हुक्म का अंत है ? टेबिल के बीच में बिखरे सारे कागज़ों को हटाकर खेलने के लिए जगह बनानी पड़ेगी । हाथ में एक टुकड़ा खड़िया चाहिए और वह उस खड़िया से एक-एक चित्र बनाकर बोलेगी - 'यह छोटी माँ है, यह चिड़िया है, यह जॉली है अर्थात् घर का भौं-भौं ।' कौन क्या चीज़ है, यह उसे छोड़कर और कोई भी नहीं जान पाता था और एक ही चीड़ को बार-बार मुझे समझाते हुए वह थकती भी नहीं थी । मेरे टेबिल पर कागज़ दबाने के लिए देश-विदेशों की विभिन्न नदियों से उठाकर लाए गए सुन्दर चिकने पत्थर रखे रहते थे । उनमें से कोई हज़ारीबाग जिले के राज रोप्पा के किनारे से लाए गए थे । परन्तु बुण्डू के लिए तो ये सभी खेलने के साबुन थे । हाथ में लेकर वह साबुन घिसेगी और मेरे शरीर और चेहरे पर लगा देगी और आँखों में लगाने के समय उसकी आज्ञा से मुझे भी आँखें बन्द करनी होंगी । उसके बाद झूठ-मूठ का स्नान करा देगा । शरीर पोंछकर चावल खाने के लिए देगी । उसी बीच उसे भी चावल खाने के लिए देना होगा । इन सब को समाप्त होने में वास्तव में दो मिनट से अधिकर समय नहीं लगता । उसके बाद ही गेंद लेकर 'गोल' वाला खेल प्रारम्भ होगा । नहीं तो छत पर जाकर 'पकड़ो-पकड़ो-रेडी' खेलने के लिए ज़िद कर बैठेगी ।

        ऐसे करके बुण्डू के खेल में फँसकर कई दिन हमारी सवेरे की पढ़ाई चौपट हो जाती थी । उस दिन कॉलेज बन्द था । मैं दोपहर में सो रहा था । ऐसे में बुण्डू हमारे पास आकर हमारी पीठ पर अपना हाथ घुमाने लगी । बहुत अच्छा लगा । दो कच्चे-कच्चे नरम हाथ मेरी पीठ पर शरारतपूर्वक घूम रहे थे । इससे मुझे बहुत आराम मिल रहा था । इसी समय मैंने देखा कि उसकी माँ उसे ढूँढ़ते-ढूँढ़ते वहाँ पहुँच गई । वास्तव में वह दोपहर में अपनी माँ के पास सो रही थी और नींद खुलने पर चुपचाप भागकर आ गई । माँ ने जागकर देखा कि बुण्डू नहीं है, कहीं से कोई आवाज़ भी नहीं आ रही है । अतएव बुण्डू अवश्य ही किसी तोड़-फोड़ में व्यस्त है तो माँ ने वहाँ आकर देखा कि बुण्डू हमारे जूते का काला पालिश थोड़ा-थोड़ा निकालकर हमारे पास बैठकर उसे हमारी पीठ पर अच्छे से मल रही है । बीच में मुझे तनिक क्रोध भी आया । मेरे जूते का पालिश भी गया । फिर दोष भी मेरी ही था । मैंने उसे अच्छी तरह से देखा क्यों नहीं । वास्तव में दो वर्ष की छोटी लड़की को लेकर घर के सभी लोग व्यस्त रहते हैं । कब क्या कर बैठ, इसका तो कोई ठिकाना ही नहीं है ।

        उस दिन सड़क पर निकला था, अचानक काफ़ी भगदड़ मच गई । बम्बई में कांग्रेस के बहुत से नेता अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अधिवेशन के बाद गिरफ्तार हो गए । भारतवर्ष की सारी विक्षुब्ध जनता पागलों की तरह उलटा-पुलटा करके घूस रही था । कलकत्ते में भी तार पहुँचा, जिसके फलस्वरुप पुलिस की ओर से गोलियाँ भी चलीं । जनता के इस विक्षुब्ध मनोभाव को व्यर्थ प्रयास से फलप्रद अहिंसा के मार्ग पर आज कौन नियंत्रित करेगा ? महात्मा गांधी ने प्रत्येक दिन प्रत्येक वर्ष जन-शक्ति को सत्य के मार्ग पर चलाने का प्रयास किया है । उनकी वाणी को सभी व्यक्तियों के बीच प्रसारित करने का प्रयास भी कम लोग ही करते है, परन्तु यह प्रयास कितना सामान्य और कितना अकिंचन हुआ है, आज उसी का परिचय मिल रहा है ।

        घर से निकलकर सीधे गाड़ू में बैठकर निकला हूँ, साथ ही मैंने नित्य व्यवहार की दो-चार वस्तुएँ ही ली हैं । जैसे सामान लेकर भारतवर्ष के तीर्थों से तीर्थ का भ्रमण किया है, आज भी हमारे साथ उससे अधिक और कुछ भी नहीं है । मोटर जब शहर की सीमा में आकर आदि गंगा के पुल पर से पार हुई तब मैंने देखा कि वर्षा के नये जल से यह छोटा नाला मानो एकदम भर गया है ।मटमैला पानी दोनों किनारों से निकलकर साहब लोगों के बगीचे और घर में भी पहुँच गया है । मेरा भी हृदय पता नहीं क्यों, भर उठा कहीं भी कोई दीनता नहीं, अभाव नहीं, गंगा के किनारे भी आज पूर्ण रुप से डूब गये हैं । पुल पार करके सरकारी गाड़ी के एक सुनसान रास्ते की ओर मुड़ते ही खाकी पोशाक पहने हुए एक सिपाही ने आकर ड्राइवर से गाड़ी रुकवाने का प्रयास किया, परन्तु ड्राइवर चिल्लाकर 'राजबन्दी' यह बात कहकर तेज़ी से गाड़ी चलाते हुए निकल गया ।

        छह हाथ लम्बी छह हाथ चौड़ी एक छोटी-सी कोठरी, दीवार पर प्राय: कमर तक अलकतरा लगा हुआ था और उसके ऊपर चूना किया हुआ था । उस पर हाथ से अंग्रेज़ी में लिखा था करीम । लगता है करीम नाम का कोई बन्दी इस कमरे में रह चुका है । शाम हो या न हो, ताले लगा दिये जाते हैं । दोपहर को भी दो घंटा ऐसा ही नियम था । बहुत ऊपर एक छोटी खिड़की है, उसमें से वर्षा के छींटे आते है, इसीलिए लगता है कि उसे कम्बल से बाँधकर लगभग बंद ही कर दिया गया है । सामने लोहे का मोटा दरवाजा है । उसके भीतर से होकर एक तरफ जाने पर एक आम के पेड़ की मात्र फुनगी दिखाई पड़ती है । सुबह कौए और मुर्गे की आवाज़ के साथ मच्छरों की आवाज भी सुनी जा सकती है । सुबह होने पर जब कमरा खुलता है, तब दीवार के पास तीस-चालीस हाथ जगह में हमारे समान ही और भी पाँच लोग मिलकर टहलने निकलते हैं, परन्तु ठीक उसी स्थान पर धूप को पहुँचने में थोड़ी देर लगती है ।

        एक सफ़ेद रंग का बगुला आम के पेड़ की फुनगी पर से उड़ा गया । उसके पंखों पर सुबह का प्रकाश ऐसा लगता था, मानों सुनहली रंग की छाया लग गई हो । बगुले मछली वाले तालाब के पास ही तो अधिक मिलते हैं, लगता है पास में ही कोई बड़ जलाशय है । एक बार मैंने देखा कि एक कठफोड़वा चोंच में सूखे पत्ते वाले पीपल की टूटी टहनी लेकर उड़ा चला जा रहा है । लगता है इन दिनों उसके पास घर बनाने का प्रयोजन अधिक है, यदि नहीं होता तो सुबह से ही वह टहनी-पत्तों को इकट्ठा करने में इतना व्यस्त क्यों होता ?

        सिर के बहुत ऊपर बादलों की गोद में चील एवं कोओं के दल उड़ रहे थे और उनके बीच में कभी-कभी अंग्रेज़ों द्वारा उड़ाये गये जहाज़ के प्रशिक्षित पक्षी के समान ही और भी कुछ पक्षी दिख रहे थे । कभी-कभी कबूतरों का दल इस विशाल हिंसक पक्षी की चीख सुनकर नीचे होकर इधर-उधर भागने का प्रयास करते ।

        इतने दिनों में दाढ़ी बहुत बढ़ गई थी । आज दाढ़ी बनानी होगी । देश के नेताओं में बहुत से लोग दाढ़ी बढ़ाकर बाहर निकले हैं । हमारी तो वैसी स्थिति नहीं है, अत: दाढ़ी बनानी होगी । मैं अपनी थैली से दाढ़ी बनाने का सामान बाहर निकालकर पानी लेकर टेबिल के सामने बैठा । फिर साबुनदानी को खोला तो अचानक देखा कि साबुन पर कच्चे-कच्चे अँगुलियों और नाखूनों के दाग थे । सच ही तो है उस दिन बुण्डू को खोलने के लिए हमारी साबुनदानी दी गई थी और उसने जी भर कर उसे खोद-खोद कर हाथ और मुँह में लगाया था ।

        आज अपने निराले कमरे में बैठकर उसकी अँगुलियों का दाग बहुत अच्छा लग रहा है । कितने दिनों तक यहाँ रहना होगा, यह तो पता नहीं है । अपनी इस छोटी-सी सम्पत्ति को नष्ट करने में आज बहुत माया लग रही है । न हो तो दाढ़ी न बनाऊँ बुण्डू के अँगुलियों की दो छोटे-छोटे निशान तो हमारे पास रह जायेंगे ।

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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प्रकाशक : इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र सेंट्रल विस्टा मेस, जनपथ, नयी दिल्ली - ११० ००१ के सहयोग से वाणी प्रकाशन २१-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - ११० ००२ द्वारा प्रकाशित