परिव्राजक की डायरी

हठयोग


मैं जब इतिहास का अन्वेषण कर रहा था, उसी समय ब्रजनाथ उपाध्याय से मेरी पहली भेंट हुई थी । मैला चेहरा, बंगाल के एक बहुत पुराने ज़मींदार वंश में जन्म और लालन-पालन के फलस्वरुप भी बेचारे का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं था अर्थात् हृष्ट-पुष्ट शरीर को लेकर उनका उठना-बैठना कठिन था । ऐसी स्थिति में मैदान-घाट घूमकर इतिहास का अन्वेषण करना उनके लिए सम्भव नहीं था । इसी कारण ब्रजनाथ बाबू ने एक स्थान पर रहकर ही इतिहास के अन्वेषण की ओर ध्यान दिया । थोड़े ही दिनों में शिलालेख या ताम्र युग के विषय में उन्हें काफ़ी जानकारी हो गई । स्वदेश और विदेश की विभिन्न पत्रिकाओं में पुरातन लेखमाला पाठों की खोज करके उन्हें पढ़कर उन्होंने विशेषज्ञों की दृष्टि को अपनी ओर खींचा । ब्रजनाथ बाबू को यह सुविधा भी थी कि उन्होंने संस्कृत भाषा अच्छी तरह सीखी थी । इसके अतिरिक्त उनके पास कोई सांसारिक अभाव भी नहीं था । ज़मींदारी के ऊपर से पिता के पेंशन की आय सिलने से सांसारिक चिंता का कोई कारण भी नहीं था । मन का आनन्द उन्हें संस्कृत व्याकरण, अलंकार शास्र और प्राचीन लिपियों को पढ़ने का प्रयास जैसे सुख की ओर बढ़ाता था । यथासमय विवाह भी हुआ था । पत्नी कमला वास्तव में लक्ष्मी के समान थीं । परन्तु प्राचीन ख़ानदानी घर के परदे में रहने और प्रत्येक वर्ष संतान होने के फलस्वरुप थोड़े ही समय में रोगी होकर बेचारी ने बिस्तर पकड़ लिया । लम्बे समय तक बीमार रहने के बाद अंतत: संसार में सभी की आँखों से जल प्रवाहित करके उन्होंने सदा के लिए इस संसार से विदा ले ली । ब्रजनाथ बाबू की एक विधवा भगिनी ने छोटे-छोटे बच्चों के लालन-पालन का भार लिया । ब्रजनाथ बाबू स्वयं मानो सब कुछ भूलकर इतिहास के अन्वेषण में डूबने की साधना करने लगे ।

ये सारी बातें थोड़ी-थोड़ी करके वर्षों से मेरे कानों में आती रहीं । उसके बाद देश में राजनैतिक उथल-पुथल हुई । उसी दुर्योग में कौन, किसको, कहाँ छोड़कर चला गया, मैं उसका लेखा-जोखा नहीं रख सका । देश पर संकट पर संकट घिरने लगा । हिन्दू-मुस्लिम दंगे के फलस्वरुप रास्तों में रक्त की नदी बहने लगी । कलकत्ता महानगरी के रास्ते दिन-दोपहर में सुनसान हो गये । वह भी एक विचित्र दृश्य था । घरों के दरवाज़े खिड़कियाँ बंद करके छत के ऊपर गिद्धों का दल चील-कौओं की भाँति बैठा रहता था और रास्ते में पड़े विगलित शव को लेकर उनमें खींचातानी होती थी । लगता था मानों सारा शहर श्मशान भूमि में परिणत हो गया हो । उसके बाद भारत टूटकर दो भागों में विभाजित हो गया, किन्तु उससे भी शांति नहीं आई । इन सारी घटनाओं के बहाव में मैं ब्रजनाथ बाबू को बिल्कुल भूल गया था । इतिहास को लेकर बीच-बीच में मुझे ब्रजनाथ बाबू का नाम याद आता, परन्तु उस रास्ते को छोड़ कर उनसे मेरा योगायोग रह पाना सम्भव नहीं था ।

आज दोपहर में किसी काम से बाहर निकला था । घर की गली से बाहर आकर जब मैं मुख्य सड़क के फुटपाथ से होकर चलने लगा उसी समय एक व्यक्ति अचानक मेरे सामने आकर मेरे रास्ते को रोककर खड़े हुए और फिर उन्होंने मुझे हाथ जोड़कर नमस्कार किया । उत्तर में मैं भी नमस्कार करके कुछ देर तक उनके चेहरे को देखने के बाद बोला, "ठीक से पहचान नहीं पा रहा हूँ ।" उन सज्जन पुरुष के शरीर पर पुराने समय का कुर्त्ता झल कर रहा है । शरीर अत्यंत दुर्बल है और हाथ-पैर उससे भी अधिक, चेहरे पर छोटी दाढ़ी उगा हुई है, वह भी कच्ची-पक्की, दाहिनी आँख की पुतली उठते ही दाहिनी आँख स्वयं खुलकर पुन: बंद हो जाती है । यह देखकर मुझे लगा कि बोरी-बोरी रोग के बाद कई लोगों की आँखें ऐसे ही ख़राब हो जाती हैं सम्भवत: इन्हें वही कुछ हुआ होगा । लगातार देखते हुए भी मुझे याद नहीं आ रहा था कि मैंने इन सज्जन को कब देखा है ?

मेरे पूछते ही वे बोले, "मैं ब्रजनाथ उपाध्याय, पहचान नहीं पा रहे हो ?" विस्मय से लज्जित होकर मैंने कहा, "भाई, आपका चेहरा ऐसा हो गया है ?" तब ब्रजनाथ बाबू अपनी कहानी कहने लगे । वे बोले, "भाई जो मोटापा तुमने देखा है, यह सब हठयोग का फल है । मेरी वह बीमारी याद है न, अब वह कुछ भी नहीं रहा । पहले शरीर रोग से ग्रसित था, परन्तु अब योग बल से मैं अप्रयोजनीय कुछ भी नहीं रखता । खूब अच्छा हूँ ।"

मैंने कहा, "परन्तु शरीर तो उतना अच्छा नहीं दिख रहा है । हठयोग करने पर उसके अनुरुप आहार भी तो चाहिए ।"

ब्रजनाथ बाबू बोले, "मैं एक बार ही भोजन करता हूँ । पिताजी की मृत्यु के बाद आय कम हो गई है और ज़मींदारी की स्थिति तो तुम जानते ही हो ।"

मैं बोला, "एक बार भोजन करने पर भी यदि घी आदि अधिक खाओ तो हठयोग से शरीर ख़राब क्यों होगा ?"

ब्रजनाथ बाबू ने छोड़ हँसकर उत्तर दिया, "परन्तु एक बार का भोजन भी अर्द्धाद्व न करने से पोट में ही ठहरा हुआ है । इसमें ऐसा ही होता है । मेरे बाहर यह क्यों देखते हो, भीतर से तो मैं परम शांति में हूँ । सभी ईश्वर की कृपा है ।"

मैंने पूछा, "परन्तु आपने यह रास्ता कैसे पकड़ा किसी से दीक्षा तो नहीं ली है ?"

ब्रजनाथ बोले, "यह मुझे रास्ते में ही मिला । साधु, फ़कीर लोग कृपा करके रास्ता दिखा देते हैं । मैंने उन्हीं से यह सीखा है ।"

शरीर की स्थिति को देखकर आशंका से भरकर मैंने पूछा, "क्या आप नेति, धोति, आदि भी करते हैं यह सब रोज़ कितनी देर करते हैं ?"

ब्रजनाथ बोले, "चौबीसों घंटे, तुम्हारे साथ अभी बात कर रहा हूँ और भीतर-ही-भीतर यह क्रिया निरंतर चल रही है ।"

मैंने पूछा, "आपको ये गुरु कब से मिले ?"

ब्रजनाथ बोले, "कमला तो तुम्हे याद है न ? वह जिस दिन चली गई, उसको भी अब लगभग बारह वर्ष हो गये, उसके अगले साल से ही मैंने हठयोग का रास्ता अपनाया ।"

हठयोग का मूल कहाँ है, यह जानने के लिए मैंने पूछा, "परन्तु भाई, आपकी आँखों काया कुछ ख़राब हो गई है ?"

ब्रजनाथ बोले, "नहीं बिन्दुमात्र नहीं । दाहिनी आँख बंद हो गई है और साथ-ही-साथ मुझे एक अद्भुत शक्ति मिल गई है अर्थात् शिव की भाँति मेरा भी तीसरा नेत्र खुल रहा है ।"

पुराने मित्र के लिए सहसा मेरे अन्तर्मन में एक वेदना-सी जाग उठी । इस स्थिति में मुझे उनके पुत्र और पुत्रियों के सम्बन्ध में कुछ पूछने की इच्छा नहीं हुई । ब्रजनाथ बाबू का हाथ थपथपाकर मैं वहाँ से चल पड़ । जाते समय वे स्वयं बोले, "मेरा बड़ा लड़का लिखने-पढ़ने में बहुत तेज़ है परन्तु मैं किताब-कापी कुछ भी तो खरीदकर नहीं दे पाता, इसीलिए लिखने-पढ़ने में क्षति हो रही है । भाई, तुम्हें तो लिखना-पढ़ना अच्छा लगता है । लड़के को एक दिन भोज दूँगा । उससे बात करना, तुम्हें स्वयं भी प्रसन्नता होगी और लड़के का भी भला होगा । तुम्हारे घर का नम्बर क्या है ?"

मैंने मकान नम्बर बताया । ब्रजनाथ बाबू उसे रटते-रटते हँसते हुए विदा लेकर हमारी ही गली के रास्ते से ना जाने कहाँ चले गये ।

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९७

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प्रकाशक : इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र सेंट्रल विस्टा मेस, जनपथ, नयी दिल्ली - ११० ००१ के सहयोग से वाणी प्रकाशन २१-ए, दरियागंज, नयी दिल्ली - ११० ००२ द्वारा प्रकाशित