हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 54


IV/ A-2053

शान्तिनिकेतन

13.6.42

श्रध्देय पंडितजी,

              सादर प्रणाम!

       आपके दो-तीन पत्र आ चुके हैं और आपने कई छोटे-मोटे काम भी करने को दे रखा है, फिर भी मैं आपको अब तक उत्तर नहीं दे सका। पिछले पंद्रह दिन मेरे लिए बड़े कठोर सिद्ध हुए हैं। घर मे मेरी पत्नी बीमार है। मुझे बच्चों को सम्हालने से लेकर रोगी की शुश्रूषा तक सब कुछ अकेले ही करना पड़ा है। बहुत कष्ट में रहा हूँ। इच्छा रहते हुए भी, आपको पत्र नहीं लिख सका हूँ। अब पत्नी की तबीयत कुछ अच्छी हो रही है। फुरसत पाते ही मैं आपकी सभी आज्ञाएँ यथाशीघ्र पालन करने की कोशिश कर्रूँगा। नदियों के माहात्म्य के विषय में बहुत कुछ संग्रह कर चुका हूँ, पर वह इतना अधिक है कि मधुकर लायक बानने में काफी परिश्रम करके संक्षेप करना पड़ेगा। नदियों के माहात्म्य संस्कृत साहित्य में इतने प्रकार से आये हैं-  

  • काव्यों में - सौन्दर्य की दृष्टि से

  • पुराणों में - पुण्य की दुष्टि से

  • आयुर्वेदिक ग्रंथो में - स्वास्थ्य की दृष्टि से

  • ज्योतिष ग्रंथो में - उनके बहाव आदि पर से शुभाशुभ फल की दृष्टि से

  • फुटकल

       पाँचों का थोड़ा-थोड़ा संग्रह देना उचित होगा।

       आशा है, आप सानन्द हैं।

Rs. 7 by m.o. immediately to be sent.

आपका

हजारी प्रसाद  

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली