हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 53


IV/ A-2052

शान्तिनिकेतन

28.5.42

श्रध्देय पंडितजी,

              सादर प्रणाम

       कृपा-पत्र यथासमय मिल गया था। बीच में कई दिन के लिए कलकत्ते चला गया था, समय पर जवाब नहीं दिया। विश्वभारती पत्रिका का दूसरा अंक आपको अच्छा लग रहा है, जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई। परिषद् की ओर से भिजवाया हुआ मनीआर्डर (६रुपये का) आ गया।

       श्री L. K. Elmhirst का पता इस प्रकार है।-

            L.K.ELMHIRST Esqr.

                  TOTNES,

                  DEVONSHIRE

                  ENGLAND

       उनकी जीवनी मुझे कहीं नहीं मिली। गुरुदेव ने अपनी एक चिट्ठी में उनके बारे में लिखा है। वह चिट्ठी मैं खोज कर निकाल नहीं पाया। पर शीघ्र ही मिलने पर अनुवाद करके भेज दूंगा। मधुकर में उनके नाम के आगे स्व. छपा है। कृपया उसका अर्थ स्वनामधन्य समझिये स्वर्गीय नहीं आपने लिखा है कि उन्होंने ६० हजार से कम न दिए होंगे। ६० हजार क्या वे कई वर्षों तक श्रीनिकेतन को ५० हजार वार्षिक देते रहे और अब भी करीब ४०,००० रुपये वार्षिक देते हैं। श्रीनिकेतन उनहीं की सहायता से आरंभ हुआ है। वस्तुत: उन्होंने ही पहले-पहल गुरुदेव के साथ गुरुकुल गाँव में अकेले ही धूनी रमाई थी। वे बहुत ही महान् हैं। प्रत्यक्ष सहायता के अतिरिक्त अप्रत्यक्ष रुप से भी उन्होंने विश्वभारती को सहायता दी है। लेकिन श्रीमती एल्महस्र्ट ही वस्तुत: रुपये की मालकिन हैं। उनसे विवाह होने के बाद ही श्रीमान् एल्महस्र्ट ही धनी हुए हैं और इस दान यज्ञ का बड़ा अंश श्रीमती की सहृदयता का ही फल है। मैं उनके जीवन के विषय में कुछ और तथ्य आपको भेजूँगा। और सब कुशल है।

       आशा है, आप सानंद हैं।

आपका

हजारी प्रसाद

पुनश्च:

       अजमेरी जी की कविता पाने के लिए कहाँ पत्र लिखूँ। पता लिखिए। मैं व्यक्तिगत रुप से उसका कुछ पारिश्रमिक भिजवा दूँगा।  

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली