हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 22


IV/ A-2023

Personal

शान्तिनिकेतन

3.4.38

पूज्य चतुर्वेदी जी,

              प्रणाम!

       कृपा-पत्र और लेख मिले। आपने जो विचार व्यक्त किये हैं, उससे मैं लगभग पूर्ण रुप से सहमत हूँ। दो तीन महीने पहले उत्थान में मैंने ऐसे ही विचार प्रकट करने के कोशिश की थी, यद्यपि उसका विषय कुछ और (हिन्दी भाषा कैसी हो) होने के कारण वह ज़यादा एकेडेमिक-सा लगता था और आपके लेख में जो जोर है, उसका तीन चौथाई उसमें नहीं था। आपने उचित मौके पर अधिकारपूर्वक इस विषय की ओर साहित्य सम्मेलन का ध्यान आकृष्ट किया है। आपने नाना प्रदेशों में वास किया है और प्रत्यक्षत: तत्तत् प्रदेशों की जनमण्डली का हिन्दी भाषा के प्रति रुख़ जाना है। मैं इतना अनुभव नहीं रखता। मैंने सारी जिन्दगी बंगाल और यू.पी. में काटी है। Nौर हिन्दीभाषी प्रदेशों में एकमात्र बंगाल के ही देखनेसमझने का अवसर मुझे मिला है। सो इस प्रदेश के बारे में आप मुझसे अघिक ही अनुभव रखते हैं। फिर भी एक बात में आपकी कुछ सहायता कर सकता हूँ। मैंने बंगला साहित्य पढ़ा है, बंगाली मित्रों के बीच दिनरात वास किया है। आपकी अपेक्षा कहीं अधिक बंगाली हो सका हूँ, इसलिये उनकी मनोवृत्ति भी समझ सकता हूँ। (आपको यहाँ से लौटती बार जब मैं ग्वालियर गया था तो कुछ विद्यार्थियों ने मुझे बंगाली ही समझ रखा था, ऐसा जान पड़ा और आगे जो लिखने जा रहा हूँ, उससे आपको मालूम होगा कि बंगाल में बहुत हाल में जो आन्दोलन शुरु किया जाने वाला है, उसके अनुसार मैं खाँटी बांगाली हो जा सकूँगा।)

       बंगाल के साहित्यिकों के साथ घनिष्ठता बढ़ाने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ है। ऐसे आदमियों की कमी नहीं है जो स्वीकार करते हैं कि बंगाल में हिन्दी प्रचार होना चाहिये। परन्तु उनमें सौ फी सदी हिन्दी साहित्य के ही जिज्ञासु हैं। अर्थात् वे हिन्दी साहित्य को जानना चाहते हैं। हिन्दी भाषा को नहीं। मुझे ऐसा बंगाली विद्वान् नहीं मिला है, जो बिना किन्तु लगाये हिन्दी के प्रति अपना अनुराग व्यक्त करता हो। हमारे कई मित्रों ने प्रेमचंद जी और सुर्दशन जी की कहानियों का अनुवाद करना शुरु भी किया है, पर सही बात यह है कि हिन्दी साहित्य के प्रति उनका अनुराग बढ़ नहीं पाता। वे उस साहित्य में अपनी क्षुधा मिटाने की पूरी तैयारी नहीं पाते। कुछ तो अपनी उपेक्षा से और कुछ हमारी साहित्यिक दरिद्रता के कारण। जो कुछ अच्छा साहित्य रचित भी हुआ है, उसका प्रदर्शन हम नहीं कर सके हैं। आपको एक ताजी घटना सुनाऊँ। गुरुदेव ने एक सप्ताह पहले हम लोगों को बुला कर हिन्दी साहित्य के बारे में बातचीत की। उस दिन हम भी पूरे मूड में थे और गुरुदेव भी। वे बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने कहा कि तुम्हारी भाषा बड़ी शक्तिशालिनि है, तुम्हें अभी आदमी नहीं मिला है, नहीं तो यह भाषा नि:संदेह भारतवर्ष की सर्वाधिक सम्पन्न भाषा होती। मैंने प्रेमचंद जी की याद दिलाई, उन्होंने अफसोस के साथ कहा, यह दु:ख की बात है कि प्रेमचंद इसी उमर में चल बसे। उनसे तुम्हें बहुत आशा थी। इसके बाद ही आपकी दिशा में रहनेवाले एक वृद्ध साहित्यिक ने (प्राइवेटली कह दूँ पं. लोचन प्रसाद पाण्डे) अपनी संग्रह की हुई हिन्दी की वर्तमान कविताओं का सर्वश्रेष्ठ संग्रह भेज दिया। गुरुदेव ने उसे उलटपुलट कर देखा और अत्यन्त निराश भाव से दूसरे दिन कहा बापू याइ वलो ना केन, तोमादेर एखनो साहित्यिक सेन्स हय नि! (यह वाक्य अख़बारों में छपाने के लिए नहीं है।) और उनकी सारी आइडिया खराब हो गई। क्योंकि इस संग्रह के वृद्ध संग्राहक गुरुदेव से मिलकर यह इम्प्रेसन डाल चुके थे कि वे हिन्दी के धनी धोरी हैं। गुरुदेव से मैंने फिर जोर देकर कहा कि यह आधुनिक हिन्दी काव्य का उत्तम प्रदर्शन नहीं है। वे बोले तो तुम क्यों नहीं एक अच्छा संग्रह करते। ऐसे ही संग्रहो के बल पर तुम हिन्दी साहित्य के प्रति दूसरों का प्रेम आकृष्ट करोगे। लेकिन सच पूछिये तो मैं लज्जा से तब और भी अधिक गड़ गया जब उस पुस्तक में सचमुच ही उन कविताओं के बल पर राष्ट्रभाषा का डिण्डिम घोष किया गया था। मैं कहता हूँ कि क्यों हिन्दी को हिन्दी नहीं कहा जाता। क्यों उसे मातृभाषा नहीं कहा जाता, क्यों इस बात को स्वीकार करने में हम हिचकते हैं कि उसके द्वारा करोड़ों का सुख दु:ख अभिव्यक्त होता है? राष्ट्रभाषा अर्थात् तिजारत की भाषा, राजनीति की भाषा, कामचलाऊ भाषा यही चीज़ प्रधान हो गई और मातृभाषा, साहित्य भाषा, हमारे रुदन हास्य की भाषा गौण! हमारे साहित्यिक दारिद्रच्य का इससे बढ़ कर अब प्रदर्शन और क्या होगा।  

       अभी देश के इसी अंक (२ अप्रैल) १९३८ में एक मजेदार लेख छपा है। यह टिपिकल बंगाली मनोवृत्ति का सूचक है और उससे से अधिक सूचक है इसी अंक में सम्पादकीय टिप्पणी, यद्यपि उसकी भाषा में उजड्डपन अधिक है। लेख का सारांश यह है कि हिन्दी भाषाभाषियों की प्रकृत संख्या १करोड़ ६० लाख के आसपास है और बंगला बोलने वाले जिनमें लेखक ने समूचे बिहार, युक्त प्रान्त के पूर्वी जिले, उड़ीसा और आसाम को लिया है, दस करोड़ के आसपास आती है। बंगला भाषा ही, इसलिये राष्ट्रभाषा हो सकती है, क्योंकि उसके बोलने वाले अधिक भी हैं और समृद्ध भी है। देश की टिप्पणी को गाली कहा जाये तो कुछ अत्युक्ति न होगी। उसमें हिन्दी भाषी खासकर बिहारियों को कड़ी सुनाई गई है। देश आपको मालूम है कि आनंदबाजार पत्रिका से संबद्ध साप्ताहिक है और उसका सर्कुलेशन भी बहुत अधिक है (शायद १२ हजार)। इस प्रकार बंगाल के लोग राष्ट्रभाषा के विरोधी हैं। यहाँ, जैसा कि मैंने पहले ही आपसे कहा था, भाषा के प्रचार की कोशिश करना व्यर्थ है। यहाँ यह प्रचार तभी सफल हो सकता है, जब सांस्कृतिक महत्त्वपूर्ण साहित्य प्रचारित हो। यह काम चुपचाप बहुत दिनें से श्री क्षिति मोहन बाबू कर रहे हैं। एक बार हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रचार विभाग ने (या ऐसी ही किसी संस्था ने मुझे ठीक याद नहीं) वर्धा से उन्हें सदस्य होने का अनुरोध किया था। उस समय क्षिति बाबू ने मुझसे एकान्त में एक बात कही थी। वह काफी गुरुत्वपूर्ण है। मैं   उनसे उनके प्रकाशित करने की आज्ञा तो नहीं ले सका, पर आपसे विषय का गुरुत्व प्रकट करने के लिये कह रखूँ। उन्होंने बताया कि मैं इस संस्था का सदस्य नहीं हो सकता, क्योंकि इसके सदस्य होने से मेरा सब कार्य चौपट हो जायेगा। लोग समझेंगे कि यह भी हिन्दी प्रचारक है। इसका अर्थ यह है कि इस प्रदेश में हिन्दी प्रचार का कार्य स्वार्थमूलक समझा जाता है और प्रचारकों के उद्देश्य को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। इस हालत में मैं तो समझता हूँ, हमें प्रचार शब्द से अपने को दूर रखना चाहिये। ध्यान देने की बात है कि जब तक प्रचार शब्द का अविष्कार नहीं हुआ था, तब तक बंगाल ने हिन्दी की बहुत जबर्दस्त सेवा की है। अब प्रचार का फल यह हुआ है कि देश के लेख में बताया गया है कि बंगालियों को कभी हिन्दी में बोलना न चाहिये।

       मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिन्दी का प्रचार अच्छे साहित्य के निर्माण से ही हो सकता है। अगर आप इस प्रदेश में अपने साहित्य और मातृभाषा की मर्यादा रखना चाहते हैं तो अपना साहित्य समृद्ध कीजिये और उसके उत्तम अंगों का परिचय कराइये। और कोइ भी रास्ता मुझे सुगम नहीं जान पड़ता। हमें दुनिया भर के झमेलों में पड़ कर अपनी शक्ति नष्ट करने अपेक्षा घर संभालने में अपनी सारी शक्ति लगानी चाहिये। आपने बिल्कुल ठीक कहा है कि अपने अन्य भाषाभाषी मित्रों से हमें साफ़ कह देना चाहिये कि हिन्दी प्रचार का काम हमारे स्वार्थ का नहीं है। इसमें अगर आपको कोई फायदा मालूम होता हो तो सीखिये, नहीं तो अपने-अपने रास्ते जाइये। इसमें इतना और जोड़ देना चाहिये कि अगर आपको इसमें फायदा मालूम होता है तो कृपापूर्वक हमें आज्ञा दीजिये, हम यथासमय सेवा करने के लिये तैयार हैं।   

       (पत्र बहुत लंबा हो गया। आपको अगर इसमें कोई बात उपयोग योग्य जान पड़े तो ले लीजियेगा। देश के लेख और टिप्पणी की कटिंग भी भेझ रहा हूँ।)

       इस समय शान्तिनिकेतन में ७७ विद्यार्थी हिन्दी शिक्षा पा रहे हैं। ३० सदस्य हिन्दी समाज में हैं। ६ बंगाली अध्यापक हिन्दी में अपने विचार प्रकट करने की चेष्टा करते हैं। यह सब कुछ करते समय मैंने सदा अपनी नीति चुप रहने की ही रखी है। प्रचार-प्रचार करते रहने से काम खराब होता है। यदि इस पत्र के किसी वाक्य के प्रकाशन से आपको ऐसा पड़े कि मेरी चुप-चाप की नीति पर कोई भला-बुरा असर पड़ता है तो उसे मेरे नाम से न दीजिये।

       (यह जानकर अफसोस हुआ कि आपकी होली खुश्क ही गई। खैर, कुछ चिन्ता नहीं, इस ग्रीष्मकाल में भी पद्माकर जी का नुस्ख़ा इस्तेमाल कीजिये तो हरिअरी आ सकती है श्रई इन्द्रायण सिंह जी से प्रेम कहिये तथा गौरीशंकर जी द्विवेदी और जैन जी को मेरा प्रणाम। अन्य सभी मित्रों को मेरा स्मरण करा दीजिये। यहाँ कुशल है।)

आपका

हजारी प्रसाद द्विवेदी  

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली