हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 13


IV/ A-2011

शान्तिनिकेतन

7.5.36

श्रध्देय पंडित जी,

              प्रणाम!

       कृपा-पत्र मिल गया। इस सप्ताह शायद मेरा आना नहीं हो सकेगा, क्योंकि लड़के को थोड़ा-सा एन्फ्लुएंजा जैसा हो गया है। मुझे यह सुन कर बड़ा आनन्द हुआ कि अज्ञेय जी आ गये हैं। मैं जिस किसी प्रकार होगा, समय निकाल कर उनके दर्शन के लिए आऊँगा, परन्तु वे कब तक ठहरेंगे?

       आपके मकान मालिक महाशय ने कृपापूर्वक मेरे लिए स्थान का प्रबन्ध कर दिया है, तदर्थ मैं उनका कृतज्ञ हूँ। अभी मेरे लिए कोई कमरा खाली रखने की ज़रुरत नहीं है। जब मैं आऊँगा उसके दो दिन पहले आपको पत्र लिखूँगा। उसी समय प्रबन्ध कर लेना अच्छा होगा।

       श्री हरि बाबू के बारे में लिख कर मैंने भेजा है। आशा है मिल गया होगा। आप उसे सुधार लीजियेगा। मैंने यही सोच कर लिखा है कि आप उसे सुधारेंगे। स्केच मुझसे नहीं लिखा जाता।

       फोटो इस पत्र के साथ भेज रहा हूँ। इनमें से जो पसन्द आवे, छाप दीजियेगा। रथी बाबू 1 ने कहा कि वे लोग अगर निगेटिव पर से एनलार्ज करके छापेंगे तो चित्र अधिक सुन्दर उतरेंगे। इसीलिये निगेटिव भी भेज रहा हूँ। (दूसरे कार्ड पर) एक बात और। रथी बाबू के कहने पर एक फ्रेन्च युवक ने ये चित्र लिये थे। इस संबंध में उनका सामान्य कुछ व्यय भी हुआ है। रथी बाबू से पुछने पर उन्होंने कहा कि मैं पूछ कर उन्हें दे दूँगा। लेकिन मैं समझता हूँ, उस खर्च को हमी लोग दे दें तो अच्छा हो। कितना खर्च हुआ है, सो उन्होंने अभी बताया नहीं है।

       श्री चन्द्र गुप्त 2 जी ने इस मास की सरस्वती में शान्तिनिकेतन के अनुभव नाम से एक सुन्दर लेख लिखा है। हम लोगों के सौभाग्यवश उन्हें अपने अनुभव का वह अंश भूल गया है, जिसमें हम लोगों की असावधानी से एक वक्त उन्हें जलपान न मिलने के कारण कष्ट हुआ था। मैं अब तक लज्जित हूँ।

       जैनेन्द्र जी क्या कलकत्ते में ही हैं? उनको और सुदर्शन जी को जुलाई में ही व्याख्यानों के लिये बुलाना चाहिए। नाटकों के बारे में किसे बुलाया जाय? इन छुट्टियों में लोगों को निमंत्रित कर रखना अच्छा होता। आप अपनी तैयारी रखें (पत्रकार कला) अगस्त में आपको बोलना पड़ेगा।

       यहाँ सब कुशल है। गुरुदेव कल कलकत्ते के लिये रवाना हो गये। एडवर्ड कारपेंटर आप कुछ दिन और रख सकते हैं।

आपका

हजारी प्रसाद

छाप लेने के बाद फोटो लौटा दीजिए तो अच्छा हो।


1 . श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर - गुरुदेव के पत्र     2 . श्री चन्द्रगुप्त विद्यालंकर - हिन्दी कहानीकार।  

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली