हजारीप्रसाद द्विवेदी के पत्र

प्रथम खंड

संख्या - 10


IV/ A-2008

शान्ति निकेतन

30.3.36

मान्यवरेषु,

       प्रणाम!

       बहुत दिन पहले एक पत्र लिखा था, मालूम नहीं वह आपको मिला या नहीं। मैंने उसमें कुछ रुपये एक जगह भेजने की प्रर्थना की थी। अगर रुपये न भेजे गये हों तो उसके लिए चिन्तित होने की ज़रुरत नहीं। मैं कुछ इन्तजाम कर लूँगा। आप मुझे अगर शीघ्र बता दें कि रुपयों का इन्तजाम हुआ या नहीं, तो मैं उपकृत हूँगा। क्योंकि रुपये भेजने की अन्तिम तारीख ३१ मार्च थी। वह तो अब खत्म हो ही गई।

       शान्तिनिकेतन में small pox की बीमारी होने कारण आश्रम अनिश्चित काल के लिये बंद कर दिया गया है। आप इस समय किसी को लेकर इधर न आइयेगा। अज्ञेय जी को जैनेन्द्र कुमार जी को मैंने पत्र लिख दिया है।

       हिन्दी कविता के संबंध में मेरा जो लेख विशाल भारत में छपा था, उसके संबंध में लगभग एक दर्जन पत्र मेरे पास आये हैं। लोगों को वह पसन्द आया है। दो-एक पत्रों ने शायद उसे उद्धृत भी किया है। यह सब आपकी कृपा का फल जान पड़ता जान पड़ता है।

       दादू का अनुवाद आपका परिचित कोई प्रकाशक छाप सकेगा? समय निकाल कर कुछ व्यवस्था कीजियेगा।

आपका

हजारी प्रसाद

पुनश्च:

       श्री क्षिति बाबू रामदेव जी चोखानी के निमंत्रण पर पिछली बार कलकत्ता गये थे। जब वे यहाँ से चल चुके थे, उस समय चोखानी जी का तार आया कि सभा स्थगित कर दी गई। किन्तु क्षिति बाबू तब तक गाड़ी पर सवार हो चुके थे। नतीजा यह हुआ कि चोखानी जी को व्यर्थ ही कुछ खर्चे में पड़ जाना पड़ा। क्षिति बाबू आपसे यह कहना चाहते हैं कि अगर आप से चोखानी जी की बातचीत हो तो आप उनसे कहें कि इस समय शान्तिनिकेतन बंद हो गया है। वे लोग चाहें तो अभी क्षिति बाबू को बुला सकते हैं। नहीं तो वे बाहर निकल जा सकते हैं। क्षिति बाबू को इस बात का दु:ख है कि व्यर्थ ही इस बार चोखानी जी को कष्ट उठाना पड़ा है।

आपका

ह. प्र. द्विवेदी

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र १९९३, पहला संस्करण: १९९४

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प्रकाशक : इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र, नई दिल्ली एव राजकमल प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली