बुन्देल खण्ड की लोक संस्कृति का इतिहास

नर्मदा प्रसाद गुप्त

चिंतन

लोकधर्म


लोकसंस्कृति के स्वरुप-निर्धारण में लोकधर्म का सबसे अधिक योग रहा है, लेकिन लोकसंस्कृति के विद्वानों ने उसे अधिकतर उपेक्षित रखा है । वास्तव में, बुद्धिजीवी वर्ग और विद्वान् विशिष्ट धर्मीं की खोजबीन में ही लगे रहे और इतिहासकारों ने भी वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन आदि धर्मीं को ही महत्त्व दिया । फलस्वरुप लोकधर्म के उद्भव-विकास और उत्थान-पतन पर ध्यान नहीं दिया गया । किसी अंचल या राष्ट्र के विशिष्ट काल की धार्मिक स्थिति का पता उसके लोक (जनता) के धर्म से लगता है, विशिष्ट वर्ग में सीमित किसी खास धर्म से नहीं । इसलिए लोक का इतिहास और संस्कृति ठीक से समझने के लिए लोकधर्म का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है ।

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लोकधर्म किसी भी-भू-भाग की जनता का धर्म होता है, उसके किसी विशिष्ट व्यक्ति या वर्ग का नहीं । इसीलिए उसका कोई नाम भी नहीं होता । समय-समय पर लोकहित के लिए विशिष्ट धर्मीं का उदय होता है और वे एक निश्चित कालावधि तक लोकोपयोगी होने के कारण प्रभावी होते हैं, पर उसके बाद उनका हास हो जाता है और वे सीमित होकर अपने स्मृति-चिहृ छोड़ जाते हैं । होता यह है कि लोकधर्म उनके उपयोगी तत्त्वों या सिद्धांतों को आत्मसात् कर लेता है और उनकी निजता को निष्प्रभावी बना देता है । इस तरह लोकधर्म उस महासागर की तरह है, जो एक तरफ विभिन्न धर्मीं रुपी नदियों को पचा लेता है और दूसरी तरफ धरती के क्षुद्र कण से लेकर हर छोटी-बड़ी जलराशि तक सभी को अपनी धरोहर बाँटता रहता है । उसमें वैष्णव, शैव, बौद्ध, जैन आदि सभी धर्म अपनी व्यक्तिगत संज्ञाएँ खोकर लीन हो गये हैं, इसलिए वह उन सबका ॠणी है, लेकिन उसने हर धर्म को कुछ-न-कुछ दिया भी है जो किसी भी तरह कम महत्त्व का नहीं है ।

लोकहित या लोकोपयोगिता लोकधर्म का मानदंड है । जो भी लोक के लिए उपयोगी है, वह लोकधर्म में कोंपल की तरह फूट पड़ता है और अनुपयोगी होने पर पिले पत्ते की तरह झड़ जाता है । लोकधर्म का वटवृक्ष सदाबहारी होता है । वह अपनी विराट् काया जिस धरती पर फैलाता है, उसी से अपनी खुराक लेता है । उसकी जड़ें उसी धरती में गहरी जाती हैं और उसकी भुजाएँ स्तंभमूलों के सहारे धरती पर फैलती रहती हैं । मतलब यह है कि लोकधर्म लोकहित के लिए लोक से उत्पन्न लोकमान्य धर्म है । लोकधर्म को न तो कोई स्थापित करता है और न कोई संचालित । उसके लिए न तो कोई धर्मग्रंथ होता है और न कोई धर्माभिलेख । धर्मसंबंधी लोकमान्यताएँ जो किसी निश्चित कालसीमा में किसी अंचल या राष्ट्र के लोक में प्रचलित होती हैं, लोकधर्म कहलाती हैं । लोक की आस्था, विश्वास और मान्यता पर ही लोक जीवित रहता है और वही लोक की आत्मा तथा लोकसंस्कृति का अंतरंग है ।

समन्वय लोकधर्म की प्रमुख प्रवृत्ति है । लोक विभिन्न धर्मीं या माध्यमों से अपनी धार्मिक मान्यताओं का चयन करता है औ उन्हें इस तरह पचा लेता है कि वे आयातित नहीं लगतीं । दूसरी विशेषता यह है कि लोकधर्म अधिक व्यावहारिक होता है । असल में वह सिद्धांतों से ज्यादा आचरण का धर्म है । लोकाचरण की कसौटी पर कसकर ही लोक सिद्धांतों को ग्रहण करता है । संप्रदाय या मतवाद की गुंजाइश लोकधर्म में नहीं होती, इस कारण उसमें किसी तरह की कट्टरता, पक्षपात या भेदभाव की जगह पह सहज उदारता होती है । यही विशेषता लोकधर्म की व्यापकता का मूल आधार है ।

इन सबसे लोकधर्म का स्वरुप स्पष्ट है और मुझे यह कहने में संकोच नहीं है की लोकधर्म लोकसहज और लोकसुलभ होता है । उसमें कोई ऐसी विचित्रता या असाधारणता नहीं होती, जो लोक की पहुँच से बाहर हो अथवा जिसका लोकजीवन से कोई सरोकार न हो । लोकधर्म लोक यानी आम आदमी का धर्म है और आम आदमी की जनसंख्या गाँवों में ज्यादा है, लेकिन इससे यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए की लोकधर्म अशिक्षितों और ग्रामीणों का धर्म है और उसकी कोई अहमियत नहीं है ।

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मनुष्य के जन्म से ही लोकधर्म का प्रचलन शुरु हो गया था और संस्कृति के विकास के समानान्तर वह धीरे-धीरे उत्कर्ष पा गया । पहले मनुष्य समुदाय में रहता था, इसलिए उसका लोक समूहों में था और उसका धर्म उस समूह तक ही सीमित था । लेकिन जैसे ही उसने पर्वत की गुफाओं में कई समूहों का पारस्परिक सहयोग स्वीकारा, वैसे ही उसके लोक की सीमाएँ बढ़ती गईं और पर्वतों से उतरकर मैदान में बसने से तो लोकसंस्कृति का रुप ही बदल गया । इस तरह मोटे तौर पर इस दीर्घकाल को दो भागों में रखा जा सकता है-१. गुफा-युग २. कृषि-युग । रामायण काल में वैदिक धर्म से संपर्क होता है और स्वाभाविक रुप में उसकी चुनौती स्वीकारने यक्षकाल आता है, जिसे हटाकर शिव-युग लगभग एक हजार वर्ष तक पदासीन रहता है । इस बीच पुराणों के द्वारा लोकधर्म में परिवर्तन का स्वरुप अंकित करना भी जरुरी है । उपरांत चंदेलकाल को अलग से महत्त्व देना ठीक समझा गया है, क्योंकि उसी समय लोकभाषा का जन्म हुआ था । फिर तोमर युग और मध्ययुग-दोनों मध्यकाल के अंग हैं । इसी प्रकार आधुनिक काल को दो भागों में बाँट दिया है-पुनरुत्थान एवं आधुनिक ।

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प्राचिन ग्रंथों से मालूम होता है कि रामायण-काल तक बुंदेलखंड आर्येतर पुलिंदों, निषादों, शबरों, रामठों, दाँगियों आदि आदिवासियों का निवास-स्थान रहा है । इस कारण इस प्रदेश के लोकधर्म में इन वन्य जातियों की धार्मिक मान्यताओं का महत्त्वपूर्ण स्थान है । गुफा-युग में धर्म सामुदायिक था । उनके देवता आध्यात्मिक न होकर जागतिक थे । उनकी अर्चा का उद्देश्य बाधाओं और विपत्तियों से रक्षा और सांसारिक सुखों की प्राप्ति था । उपयोगिता ही देवत्व की कसौटी थी । इस कारण फल, माँस, जल, शरण, रोशनी देले वाले वृक्ष, पशु, नदी-सरोवर, गिरि, अग्नि आदि का अर्चन शुरु हुआ । साथ ही भय की भावना से सर्पादि जैसे घातक जंतुओं का भी । चमत्कारी और प्रभावशाली प्राकृतिक शक्तियों के प्रति आस्था भी जरुरी थी । सभी लोकदेवों की पूजा मानसिक थी । आधिकतर उन्हें, फल और माँस की भेंट दी जाती थी, जिसकी लीक बलि की रुढि में परिवर्तित हुई थी । आग जलाकर उसके चारों ओर घेरा बनाकर कुछ गाना और नाचना मानो अग्नि को प्रसन्न करना था । इसी तरह गुफाओं में अपने मन का कोई चित्र या आकृति बनाकर उसे रक्षा का प्रतीक मान लेना एवं उस पर पूरे समुदाय का विश्वास होना अंचल के देवता की पहली कल्पना थी । कई गुफाओं में ऐसे विचित्र मानवी चित्र मिले हैं, जो देवत्व की प्राचीनतम अवधारणा के प्रमाण लगते हैं ।

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कृषि-युग में नदी घाटी सभ्यता का उद्भव हुआ था । मैदान में पहले पशुपालन, फिर कृषि-कर्म की अवस्था आई और तदनुरुप लोक और लोकधर्म का विकास हुआ । पशुओं की रक्षा और अधिक लाभप्राप्ति की लोकभावना ने पशुपति और पशुओं की पूजा को जन्म दिया । इसी तरह कृषि-कर्म की उपयोगिता बढ़ाने और फसलों को अनेक विपत्तियों से बचाने के लिए जल, नदी तथा यक्षादि को देवत्व मिला । दोनों में प्रजनन और उत्पत्ति की वृद्धि हेतु मातृशक्ति की पूजा अनिवार्य हो गई । इस जनपद की आदिम जातियाँ-शबर और पुलिंद देवीभक्त थीं, जिसका प्रमाण प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और जिससे स्पष्ट है कि मातृमूर्ति की पूजा यहाँ प्रधान थी ।-१ उसके साथ भूदेवी की पूजा भी प्रचलित हुई, जो आज तक भियाँ रानी या भुइयाँ रानी के रुप में वर्तमान है । एक कच्चे या पक्के चबूतरे पर एक छोटी-सी मढिया जिसमें कोई मूर्ति नहीं होती, भूदेवी का सबसे पुराना प्रतीक है, जो इस जनपद में आज भी अवशिष्ट है । जातकों और पुराणों में वर्णित भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र और जादू-टोना भी इसी युग की देन हैं । इनसे धर्म के आनुष्ठानिक रुप के विकास का भी पता चलता है, लेकिन प्रामाणिक साक्ष्यों के अभाव में कुछ भी कहना उचित नहीं है ।

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रामायण-काल में आर्यों की आश्रमी संस्कृति और वैदिक धर्म का प्रवेश वन्य जातियों के लोकधर्म के लिए एक महत्त्वपूर्ण घटना थी । राम की चित्रकूट-यात्रा के पहले ही यहाँ वैदिक धर्म के विद्वान् ॠषि यज्ञों के द्वारा अपने धार्मिक मूल्यों का प्रसार करने लगे थे और दक्षिण के राक्षस उनका विरेध उचित मानते थे, पर विंध्यवासियों ने नये परिवर्तन का स्वागत किया था । उत्तरांचलों से ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के दलों ने धीरे-धीरे बसना शुरु कर दिया था । इस प्रक्रिया से वैदिक देवता और वैदिक मान्यताएँ, जो लोकधर्म के लिए उपयोगी साबित हुईं, इस जनपद में घुलमिल गईं । आर्यीं के श्रेष्ठ देवता इंद्र आँधी-तूफान-बिजली-वर्षा के देव होने के कारण लोकदेवता बन गए, जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपदस्थ कर गिरि की पूजा को लोकमान्य बनाया । इसी तरह अथर्ववेद के पापमोचन सूक्त में दि गई देव-सुची में वैदिक और लोकदेवों का मेल-जोल श्री वासुदेवशरण अग्रवाल की पुस्तक 'प्राचीन भारतीय लोकधर्म' में स्पष्टत: संकेतित है ।-२ मतलब यह है कि बहुत पहले से ही देवों में किसी तरह का भेद-भाव नहीं था । हालाँकि डॉ. अग्रवाल ने वैदिक देवों की ' पद-प्रतिष्ठा' बहुत ऊँची और आदिम जातियों के देवों-यक्ष, राक्षस, सर्म, भूतादि को छुटभैये देवता कहकर दोनों वर्गों के देवों में एक अंतर खड़ा कर दिया है, जो उचित नहीं कहा जा सकता ।

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वैदिक देवताओं में यदि इंद्र का महत्त्व ज्यादा था, तो यहाँ यक्ष का । जिस तरह इंद्र अतिकाय, शक्तिवान् और प्रभावशाली थे, ठीक उसी तरह यक्ष । आज भी अश्वत्थ या पीपल के वृक्ष पर ' बरमदेव' के रुप में यक्ष देवता की पूजा हर गाँव में प्रचलित है । 'बरम' ब्रह्म का ही अवशेष है । ब्रह्म से बरह्म और फिर बरम हो जाना लोक के लिए सहज है । यक्ष निषाद-भाषा के शब्द की संस्कृत में अनुकृति है, इस मत को अर्वाचीन मानते हुए वासुदेवशरण अग्रवाल ने-३ इस जनपद में यक्ष देवता की लोकप्रियता पुष्ट कर दी है, क्योंकि यहाँ निषाद और शबर ही प्रमुख जातियाँ थीं । भरहुत के प्राचीन शुंगकालीन स्तूप में अंकित और पवाँया में प्राप्त नागकालीन यक्षमूर्तियों से प्रकट है कि इस जनपद में ईसा की पाँचवीं शती तक यक्ष-पूजा प्रचलित रही है । वर्तमान काल में बीर कौ चौंतरा (चबूतरा) और वीर-पूजा में गाये जाने वाले लोकगीत यह सिद्ध करते हैं कि यक्ष-पूजा किसी-न-किसी रुप में इतने दीर्घकाल तक बनी रही । महाभारत में युधिष्ठिर और यक्ष वाली प्रश्नोत्तर शैली भी बुंदेली लोकगीतों में सुरक्षित है । वीर-पूजा में पत्र-पुष्प, हल्दी-अक्षत, दीप-गंध, प्रसाद और लोकगीत ही प्रमुख उपकरण हैं, जो लोकधर्म की पूजापद्धति को स्पष्ट करते हैं और जिन्हें वैदिक यज्ञपद्धति के स्थान पर सर्वत्र मान्यता मिली है । प्रसाद के रुप में रोट का चूरमा बुंदेलखंड की विशेषता रही है ।

लोकधर्म की प्रमुख प्रवृत्ति समन्वयकारी रही है । उसने पुरानी मान्यताओं की गुँथी में नई मान्यताओं के नये सूत्रों को लपेटकर नवीनता का वरण किया है । बुंदेली प्रदेश में ' गोटें' अहीर और गुजरों के विशिष्ट लोकगीत हैं, जो उनके देवता ' कारसदेव' की पूजा में गाये जाते हैं । हालाँकि ये गीत १०-११वीं शती के है, परंतु उनकी कथावस्तु बहुत पुरानी प्रतीत होती है । हरियल झाँझ, खबर देने के लिए मोर का माध्यम, सुरपाल के साथ भैंसियों की कतारें, पशु ही युद्ध के कारण, रास्ते की दूरी वन से मापना, जाट-बधू की निर्भीकता आदि से यह कथा चरांगाही संस्कृति की गोद में पली हुई लगती है । उसमें कारसदेव को सूरा या वीरा और शंकर के अवतार कहा गया है । वीर या वीरा यक्षसंस्कृति और शंकर शैवकेन्द्रित लोकसंस्कृति के प्रतीक हैं । तीनों की पूजा गाँव के बाहर चौंतरों पर की जाती है । कारसदेव, यक्ष और शंकर के चबूतरों में कोई विशेष अंतर नहीं है । यक्ष या बीर या बरमदेव के चबूतरों पर या तो कुछ नहीं बना रहता या फिर मिट्टी की शंकुनुमा थूही सहज रुप में खड़ी कर दी जाती है, जिसका अवशेष आज भी अखाड़े की पट्टी में दिखाई पड़ता है और जिसे पहलवान कुश्ती शुरु होने के पहले मिट्टी चढ़ाकर पूजते हैं । उसी थूही की जगह पर पत्थर की गोल बटैया आसीन हो गई और वह शिव का चबूतरा हो गया । कारसदेव और हरदौल के चबूतरों में त्रिभुजाकार मढिया-सी बन गई । इस तरह के बदलाव साधारण नहीं हैं, वरन् लोकधर्म में युग-परिवर्तन की सूचना देते हैं । उनके आधार पर यक्ष-युग के बाद शंकर का युग आया और यह ऐतिहासिक सत्य भी है ।

बुंदेलखंड में एक उक्ति प्रचलित है-" गाँव के ठाकुर और गाँव-गाँव के बीर ।" यहाँ ' ठाकुर' का अर्थ देवता अथवा ठाकुर नामक विशेष देवता है । गोंड़ों में ' ठाकुर देव' ग्रामरक्षक ग्रामदेवता हैं, जो गाँव की दैवी अपत्तियों को दूर करता है । उसका स्थान गाँव के बाहर किसी वृक्ष के नीचे होता है और वृक्ष पर सफेद ध्वजा लहराती रहती है । आज उनका महत्त्व नहीं रह गया है, पर यक्ष-काल में दोनों देवताओं की पूजा होती थी । असल में गोंड़ों के देवता भी लेक ने अपना लिए थे और कुछ तो आज तक जीवित हैं, भले ही उनमें कुछ परिवर्तन आ गया हो । एक उदाहरण पर्याप्त होगा । गोंड़ों की ' मरही माता' हैजा और प्लेग की देवी मानी जाती है । मान्यता है कि उनकी विदा करने पर ये बीमारियाँ चली जाती हैं । विदा के समय पूजा में लकड़ी की गाड़ी, देवी की पोशाक, टिकुली, चूड़ियाँ, बकरी-बकरा, मुर्गा-मुर्गी नारियल, दारु आदि सामग्री लगती है । गाँव का पंडा या बैगा उनकी पूजा कर उन्हें गाँव की सीमा तक ले जाता है और फिर गाड़ी को देवी की इच्छा पर छोड़ देता है । जनविश्वास है की गाड़ी को बकरा जिस तरफ ले जाता है, बीमारी उसी तरफ चली जाती है । मरई माता की गाड़ी, और उनकी विदा मैंने महोबा में स्वयं देखी है । मतलब यह है कि गोंड़ों की मरही माता, खेर माई, शारदा माई, शीतला माई, धरती माता, जल, अग्नि, सूरज, भैरों, दूल्हा देव, नागेश्वर देव, बड़ा देव आदि मरई, माता, खेरे की देवी, शारदा, शीतला, भुइयाँ रानी, जल, अग्नि, सूर्य, भैरव, दूल्हा या दूला देव, नागदेव और महादेव बन गए हों, तो कोई आश्चर्य नहीं ।

यक्ष-काल नागों व वाकाटकों के राज्य की स्थापना तक अर्थात् पहली शती ईसापूर्व तक प्रसरित रहा है । पवाँया की मणिभद्र यक्ष की मूर्ति के पाद पर विदिशा के अंतिम नागराजा शिवनंदी का उल्लेख है और साथ ही उस पर अनेक दानदाताओं के नाम अंकित हैं, जिनसे यक्षों की सामूहिक उपासना का पता चलता है ।-४ कनिष्क के समय (७८ई. के लगभग) यक्ष-पूजा प्रचलित थी । कारण यह था कि यक्ष-उपासना में सभी धर्म यानी कि वैदिक, ब्राह्मण, जैन, बौद्ध आदि के अनुयायियों का मिलन बिना किसी भेद-भाव के होता था । वस्तुत: लोकधर्म एक ऐसा ही मिलनबिंदु है, जहाँ विभिन्न धर्मीं के प्रवाह एक हो जाते हैं । यक्ष, गंधर्व, किरात जातियों की देन तंत्रवाद है, जिसने बौद्ध-धर्म के वज्रयान संप्रदाय के प्रभावित किया था । आभीर एक विशेष घुमंतू कबीला था, जो पशुपालन का धंधा करता था । वह भी इस जनपद में आकर इसी समय बसा था और उसने भी यहाँ की धार्मिक मान्यताओं में कुछ-न-कुछ जोड़ा था । कारसदेव की गोटें और गहनई (गोचारण) गाथाएँ दसवीं-ग्यारहवीं शती में ही रची गयी थीं, पर उनका आधार बहुत पुरानी और मौखिक-परंपरा में चलती आयी कथा ही है । दोनों में वीर (यक्ष), शंकर और शारदा, गौरा, भैरव, कन्हैया देवी-देवताओं के नाम आये हैं, जिनसे स्पष्ट है कि कुछ यानी कि वीर, शंकर और गौरा एवं शारदा तो उस समय (रचना-काल में ) लोकप्रसिद्ध थे, लेकिन कन्हैया उतना व्याप्त नहीं था । यह संभव है कि महाभारत-काल के कृष्ण का दैवी प्रभाव बुंदेलखंड में न रहा हो । ' गाहनई' में ' कन्हैया' का ' गोचारण' उसी का परिणाम प्रतीत होता है । कारसदेव की गोटों में कारसदेव शंकर के और सूरपाल वीर (यक्ष) के आवतार कहे गये हैं, जिससे सिद्ध है कि शंकर के बाद ही कारसदेव विख्यात् हुए और कृष्ण या कन्हैया कारसदेव के बाद ।

एफ. ई. पार्जिटर ने अपनी पुस्तक ' एनशिऐंट इंडियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशान्स' में लिखा है कि चेदि राज्य पहले यादवों के आधीन था,-५ इससे सिद्ध है कि आभीरी मान्यताएँ यहाँ निश्चित ही रही होंगी । महाभारत-काल में शिशुपाल चेदि पर राज्य करता था और कृष्ण ने उसका वध किया था । कृष्ण की श्रेष्ठता का असर इस जनपद पर अवश्य रहा, पर उसे देवत्व न मिल सका । महाभारत के आदिपर्व, अध्याय ६३, छंद २,८-१२ में यह कहा गया है कि (इस जनपद में) सभी अपने धर्म में स्थित थे, जिसका आशय यही है कि लोकधर्म का फैलाव काफी था और विशिष्ट धर्म का कोई आग्रही रुप यहाँ नहीं था । मौर्य-काल में सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार साँची, जबलपुर, होशंगाबाद के जिलों में किया था, जिससे लोकधर्म के लोकतत्त्वों को और भी मजबूती मिली थी । इन सबके बावजूद यक्ष-पूजा यहाँ तब तक सर्वीपरि रही, जब तक शिव का वर्च स्थापित न हुआ ।

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शिव-काल इस जनपद में ईसा की पहली शती से लेकर तेरहवीं शती तक लगभग १३०० वर्षीं तक बना रहा । नागों और वाकाटकों ने लगभग छ: सौ वर्षीं तक अपने उपास्य शिव और उनके मंडल के नाग, चंद्र, नंदी आदि की पूजा जन-जन में फैला दी थी । उसी का प्रस्तार चंदेलों के पतन तक होता रहा और इस प्रकार शिव सर्वप्रमुख लोकदेवता के रुप में आज तक प्रतिष्ठित रहे । यह तो राजाओं के द्वारा राजसी प्रयत्न था, पर इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है-लेक का लोक द्वारा प्रवर्तन । शिव का निर्माण और स्वरुपविकास शबर, निषाद, किरात, द्रविड़ और आर्य-विश्वासों से हुआ है । बुंदेलखंड में शबर, निषाद और किरात आदिम निवासी थे, जिन्होंने शिव के भयंकर, संहारकारी और रौद्र रुप की कल्पना की थी । उनके भैरों (भैरव) भी इसी के अंग थे । भूत, प्रेत, पिशाच, बैताल उन्हीं की सेना थे । तंत्र-मंत्र भी उन्हीं की उपज थे । अतएव यक्ष के मुकाबले शिव का यह शक्तिसंपन्न रुप ज्यादा मुखर हुआ । संगीतप्रेमी किरातों ने उन्हें संगीत-नृत्य का देवता भी माना । नागों और वाकाटकों ने उन्हें राष्ट्रीय देवता के रुप में-६ प्रतिष्ठित करने की पहल की, जिससे शैव मान्यताएँ लोक में प्रचलित होना स्वाभाविक है । स्थान-स्थान पर शिव के चबूतरे, शिव-मूर्तियाँ और शिवलिंग स्थापित हो गये ।

प्रसिद्ध इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल ने अपने ग्रंथ ' अंधकारयुगीन भारत' के पृष्ठ १०४ पर लिखा है कि भगवान् शिव (संहारकर्ता) ही अपने भक्तों (भारतीयों) को स्वतंत्र करने (शकों से) के लिए उठ खड़े हुए हैं । प्रकट है कि संहारकर्ता शिव की निषाद परंपरा को ही नागों ने अपना लिया था और वाकाटकों ने भी योद्धा शिव-७ को ही मान्यता दी थी । इस राष्ट्रीय क्रांति में लोक ने भी भागीदारी की थी और हर गाँव-पुरा में शिव की बटैया या लिंग पूजित होने लगे थे । शैव होते हुए भी नाग विष्णु, सूर्य आदि दैवों के पूजक थे और धार्मिक समन्वय एवं औदार्य में विश्वास रखते थे । इस कारण लोकधर्म में भी धार्मिक समन्वय की गति और तेज हुई । शिव के साथ गंगा का और नंदी के साथ गाय का भी महत्त्व बढ़ा । धर्म में जातीय चेतना और एकता की भावना का उदय इसी समय हुआ था ।

दरअसल, ब्राह्मण धर्म में कर्मकांड की जटिलता और ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग की सत्ता के विरोध में बौद्ध धर्म आया था, जिसने बहुजनहित का उँचा उद्देश्य रखा था और जिससे लोकधर्मी तत्त्वों को बल मिला था । बौद्ध ग्रंथों और जातकों में तत्कालीन लोकधर्म के हर पक्ष के उल्लेख मिलते हैं और उसमें अनेक कुरीतियों की प्रधानता पाकर ही बुद्ध ने उसकी निंदा की था । बौद्ध-धर्म के लोकधर्मी स्वरुप से लोग उसकी तरफ आकर्षित हुए थे । किंतु बौद्धों के गृहत्याग और निर्वाण की अतिशयता के खिलाफ भागवतों ने गृहस्थ धर्म की नूतन कल्पना दी थी तथा बौद्ध धर्म के विदेशी हाथों में पहुँचने पर नागों और वाकाटकों ने शैव धर्म को राष्ट्रीय चेतना से समन्वित किया था । फलस्वरुप लोकधर्म में भी फिर एक नई चेतना आई, जिसने उसे घर-परिवार और जातीयता की नयी भावना से जोड़ा । गृहस्थ धर्म की धुरी नारी और उसके आदर्शीं की भी प्रतिष्ठा हुई । वाकाटक, गुप्तकाल में विष्णु और लक्ष्मी का प्रभाव बढ़ गया था, लेकिन शिव को छोड़ना मुश्किल था । इसलिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति और विष्णु एवं शिव की हरिहर मूर्ति महत्त्वपूर्ण हो गयीं ।

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पौराणिक युग

पौराणिक काल (५वीं से १०वीं शती) में लोकधर्म का बहुत अधिक उत्कर्ष हुआ । पुराणों की सीधी, सरल और मनोरंजक कथाओं ने वैदिक धर्म की शास्रीय रीतियों और मान्यताओं को लोकस्तर पर लाकर सर्वग्राह्य बना दिया । इतना ही नहीं उनकी समन्वयवादी नीति के कारण वैदिक-अवैदिक, वन्य-नागरी और देशी-विदेशी धार्मिक मान्यताएँ, सब एकमिल हो गईं । एक पुराण में एक देवता की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए अन्य देवों को उनके समकक्ष नहीं रखा गया, परंतु असंख्य देवों के अस्तित्व को सुरक्षित रखते हुए ऐसा सामंजस्य किया गया कि कहीं भी कोई भेद-भाव नहीं रह गया । इसी तरह अनेक देवियों की उपयोगिता अपने-आप सार्थक प्रतीत होने लगी । लेकिन साथ ही देवी का असुर-संहारक रुप इतनी ओजस्विता से उजागर हुआ कि विदेशी शकों, हूणों आदि के आक्रमणों के खिलाफ तत्कालीन लोकधर्म को एक हथियार मिल गया । महिषासुर के वध के लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश ने मिलकर एक शक्तिपुंज की रचना कर दी । इस तरह का देवी-देवताओं का संगठन लोक के लिए अनुकरणीय था, अतएव लोकधर्म में बहुदेववाद की प्रतिष्ठा आसानी से हो गई ।

अनेक प्रकार की व्रत-कथाओं का जन्म भी पुराणों की विशेषता थी और उन्हें इस तरह गढ़ा गया था कि उनसे पुत्र, धन, सुख, पाप-शमन, दीर्घायु, पारलोक-सुख, आदि की प्राप्ति का मार्ग सुलभ लगने लगा । अनुष्ठान, कर्मकांड, मंत्र-जप, बाह्म आचरण आदि इतने सरल और उपयोगी बन गये कि लोक ने उन्हें अपना लिया । इस तरह लोकधर्म की पाचन-शक्ति इतनी व्यापक हो गयी कि उसमें विदेशी तत्त्व तक हजम हो गए । फल यह हुआ कि दसवीं-ग्यारहवीं शती में बाहर से आक्रमण के समय लोकधर्म ने ही रक्षा का भार सँभाला, वरना भारतीय समाज और संस्कृति के बिखराव और टूटने के पूरे आसार मौजूद थे ।

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चंदेल -युग

चंदेल-काल (९वीं से १४वीं शती तक) के लोकधर्म की बानगी तत्कालीन लोकगाथाओं में मिलती है और उसकी पुष्टि ' प्रबोधचंद्रोदय', ' रुपकषटकम्' जैसे ग्रंथों और तत्कालीन शिलालेखों, मंदिरों आदि विविध अवशेषों से हो जाती है । अल्हाखंड की गाथाएँ, कारसदेव की गोटें, गहनई, कजरियों के राछरे आदि में लोकधर्मी देवों की पूजा के पुरे-पुरे संकेत मिलते हैं । आल्हा में हर गाथा का प्रारंभ स्थानीय देवी-देवताओं से होता है और उनमें मनियाँदेव, चंडिका, भैरव आदि की वंदना प्रधान हो जाती है । कारसदेव को महादेव शंकर के अवतार मानने से शिव की महत्ता सिद्ध होती है और गहनई में कन्हैया ग्वालमात्र हैं, लेकिन 'पिपरी के भैरमा' (पीपल या पिपरी ग्राम के भैरव) प्रमुख लोकदेव हैं । जाहिर है कि तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरुप लोक ने फिर शंकर, भैरव, चंडिका आदि संहारकारी देवी-देवता को चुना था । शिव के साथ विष्णु, गणेश, सूर्य, मुरारिकृष्ण और अनेक छोटे देवों की पूजा भी होती थी ।-८ देवीयों में भवानी, पार्वती या गौरा, लक्ष्मी, भुवदेवी के अधिक महत्त्व था । घरों में मूर्तियाँ रखी जाती थीं और उनका पूजा विधि-विधान से होने लगी थी ।-९ व्रत और त्यौहार मान्य हो गये थे तथा उनके कारण पुरोहितों का महत्त्व बढ़ गया था ।-१० दान और तीर्थयात्रा, कुँए, तालाबों और मंदिरों का निर्माण, पर्वीं पर गंगा-स्नान और गरीब भिखारियों या ब्राह्मणों को अन्न-प्रदान आदि पुण्य कार्य माने जाते थे और वे लोकधर्म के अंग थे । जिस तरह सूत्र-काल में हर कार्य को धर्म के नियंत्रण में बाँधकर एक अनुशासन खड़ा किया गया था, उसी तरह इस समय लोकधर्म में एक धार्मिक सत्ता-सी छाने लगी थी ।

इस युग में शिव के साथ शक्ति और ' अर्धनारीश्वर' का विकास हुआ, जिसके फलस्वरुप धार्मिक जीवन में नारी का प्रधानता हुई । अनेक प्रकार की देवियाँ, योगनियाँ और यक्षणियाँ प्रकट हुईं । तांत्रिक मत के प्रभाव से स्री-पुरुष के संभोग में ब्रह्मानंद की प्रतीति के अनुभवने जोर पकड़ा, लेकिन लोकधर्म ने उसे भी नहीं माना । इतना जरुर है कि लोक ने तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ आदि में अपना विश्वास व्यक्त किया । साथ ही इस प्रदेश में प्रचलित वज्रयान, नाथ या गोरखपंथ, तांत्रिक और शाक्त मतों की शाखाओं से (लोक को कोई लगाव नहीं था) निकले जादू-टोने, भूत-प्रेत, मंत्रों के बल से सिद्धियों की प्राप्ति, रोगादि व्याधियाँ दूर करने और साँप के काटने आदि में मंत्रों से उपचार जैसे अनेक विश्वास लोकप्रचलित हो गये और अघोरी, औघड़बाबा, कनफटा, नाथ बाबा जैसे स्थानीय देवता पुजने लगे । महोबा के मनियाँदेव माणिभ्रद यक्ष हैं, जो स्थानीय देवता पुजने लगे । महोबा के मनियाँदेव माणिभ्रद यक्ष हैं, जो इतिहासकार स्मिथ द्वारा भ्रमवश गोंड़ देवता-११ मान लिए गये हैं । महोबा में दो किंवदंतियाँ प्रचलित हैं-१. मनियाँदेव के सामने आल्हा का अखाड़ा था । २. मनियाँदेव के पास एक चमत्कारी मणि थी, संभवत: पारसमणि, जिसके स्पर्श से लोहा सोना बन जाता था । दोनों माणिभद्र यक्ष की मूर्ति का समर्थन करती हैं । यक्षों को स्वास्थ्य और अमरत्व का प्रतीक-१२ माना जाता था, इसीलिए उनका संबंध अखाड़ों से हो गया था और यक्षमह या ब्रह्ममह (के मेले) में कुश्ती का अखाड़ा भी अनिवार्य था । मुझे स्मरण है कि महोबा के कजरियों के मेले में अखाड़ा हमेशा बनता रहा है । इससे सिद्ध है कि यह मेला पहले यक्ष-मेला या यक्षमह ही था और मनियाँदेव यक्ष देवता ही थे । माणिभद्र यक्ष के पास एक भद्रमणि थी और वे कुबेर के खजाने के खजांची भी थे ।-१३ इस कारण मणि या पारसमणि (पारस बटैया है महुबे मा लोहा छुअत सोन ह्रै जाय) संबंधी किंवदंती प्रचलित हुई थी । यक्ष महाकाय, जल या सरोवर के समीपवाले और अग्निपुंजवत् होते थे-१४ और मनियाँदेव भी मदन सरोवर के किनारे शिलाकाय देवता हैं । उनका मंदिर बनने से उनकी महाकाया छिप गयी है। लोक ने उन्हें माणिभ्रद से मनियाँ बना दिया है, जो लोकभाषा में सहज-स्वाभाविक है । वे पहले भी लोकदेवता थे और आज भी हैं, किंतु वे स्थानीय हो गये हैं और उनकी प्रतीकात्मकता अस्पष्ट-सी है ।

लोक किस तरह एक नया देवता बनाता है और पुराने का अस्तित्व मिटाता है, इसकी एक मिसाल लोकदेवता बरमदेव हैं । बरमदेव का शुद्ध रुप है ब्रह्म देव और ब्रह्म यक्ष का पर्याय था । लोक में वह बरह्म से बरम्ह और बरम हो गया । पहले बरह्म के साथ बीर जुड़ा रहता था और यक्ष को ' बीर बरह्म' कहा जाता था, बाद में बीर और बरह्म अलग-अलग यक्ष के लिए प्रयुक्त हुए और अंत में बिर गायब हो गया तथा बरह्म बरम बनकर ब्राह्मण का अर्थ देने लगा । कुछ प्राचीन ग्रंथों में चंदेल-नरेशों के नाम चंद्रब्रह्म, जयब्रह्म, विजयब्रह्म कीर्तिब्रह्म, मदनब्रह्म आदि ब्रह्म लगाकर लिखे गए हैं,-१५ जबकि अभिलेखों में वर्मन का प्रयोग हुआ है । इस ब्रह्म का रहस्य क्या है, ? चंदेल-वंश की उत्पत्ति के संबंध में भी इतिहासकारों के मत अलग-अलग हैं । अभी तक उनके नाम के साथ जुड़नेवाले लोकप्रचलित ' ब्रह्म' का विचार ही नहीं किया गया । संभव है कि उनकी उत्पत्ति यक्ष के वरदान से हुई हो अथवा ब्रह्म या यक्ष से उनका कोई संबंध रहा हो । तत्कालीन वत्सराजकृत ' रुपकषटकम्' (पृ. ३२, १४१) में माणिभ्रद की पूजा के उल्लेखों से उक्त निष्कर्षों की पुष्टि होती है ।

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तोमर -काल

तोमर-काल लोकधर्म का संघर्ष-काल था । १३वीं शती के मध्य मुस्लिम आक्रमणकारियों ने इस प्रदेश के कई भागों को अपने अधीन कर लिया था और उनकी इस्लाम धर्म की कट्टरता ने एक संघर्ष की स्थिति खड़ी कर दी थी । विजातीय या विदेशी मान्यताओं के विरुद्ध जिस धार्मिक एकता और दृढ़ता की जरुरत थी, उसका सच्चा प्रतीक बना लोकधर्म । लोकधर्म में सहजयान, वज्रयान, मंत्रयान, शैव, शाक्त, तांत्रिक, वैष्णव मत आदि सब एक हो गये थे । ग्वालियर के नाथ संतों ने लोकधर्मी प्रवृत्ति से सभी धार्मिक भेद-भाव तिरोहित कर दिये थे । नाथपंथी कवियों ने शिव, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य आदि देवों और गौरी, शारदा, गंगा, लक्ष्मी आदि देवियों को लोकस्तर पर रखकर सांप्रदायिकता को विदा कर दिया था । बैजू, बख्शु, तानसेन के पदों में भी धार्मिक भेद-भाव का अभाव था ।-१६ इन तध्यों से स्पष्ट है कि लोकधर्म ने ही सूफी और इस्लाम से टक्कर ली थी । इस दृष्टि से यह लोकधर्म के उत्कर्ष का युग था । आज भी बुंदेलखंड में लोकप्रचलित है कि " यह आपद धर्म ह" अर्थात् आपत्ति में धर्म का रुप वही होता है, जो उस समय जरुरी है । लोक अच्छी तरह समझता था कि १४-१५वीं शती में कैसे धर्म की उपयोगिता है, इस कारण लोकधर्म ने युगधर्मी बाना पहनकर संघर्ष किया था ।

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ग्वालियर-गढ़ १५१७ ई. के लगभग मुसलमानों के अधिकार में चला गया, लेकिन तब तक इस जनपद में कई गढ़ कायम हो चुके थे । ओरछा और गढ़ामंडला, जो बुंदेलों और गोंड़ों की देन थे । दोनों में वही जागृति थी । असल में भक्ति-आंदोलन का प्रारंभिक रुप लोकधर्मी था । उसमें किसी भी तरह की सांप्रदायिकता यी किसी भी तरह के भेद-भाव के लिए कोई जगी न थी । " हरि को भजे सो हरि को होइ" ही मुख्य उद्देश्य था । कबीर के ' राम' सबके राम थे चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान । बुंदेली के निर्गुनिया गीतों में भी वही राम हैं । मध्ययुग के लोकगीतों के 'ब्रह्म' सबके हैं, सब समान हैं, ऊँच-नीच तो खुद हमने बनाये हैं-" आपन नीच ऊँच कर लेखों, आपन नीच कहाबैं ।" इसके बावजूद ब्रज में कई मत या संप्रदाय बने, जिन्होंने राम-कृष्ण को अपने-अपने संकीर्ण कठघरों में बंदं करना शुरु किया । इतना ही नहीं, हर संप्रदायों के महंतों ने अपने मत का अनुयायी बनाने के लिए प्रचार-प्रसार किया, दबाव डाला और राजनीति का सहारा लिया । गोस्वामी विट्ठलनाथ, ओरछानरेश मधुकरशाह को प्रभावित करने के लिए ओरछा गये थे । मधुकरशाह कृष्णभक्त तो हो गये, पर किसी संप्रदाय से बँधे नहीं । उन्होंने मुगल सम्राट अकबर और व्रज की दासता पसंद नहीं की-" ओरछौ बृंदाबन सो गाँव।" इन संप्रदायों का प्रसार राजा के माध्यम से होता था । लेकिन लोकधर्म तो लोक का धर्म है, अतएव उसका माध्यम लोक ही रहा । लोकधर्म की पाचन-शक्ति इतनी तीव्र थी कि उसने राम-कृष्ण-संबंधी सभी मतों को हजम कर राम और कृष्ण को लोक के साँचे में ढाल दिया । उसमें राम और कृष्ण तथा उनके परिकर के देवी-देवता अर्थात् सीता, राधा, रुक्मिन, हनुमान आदि सब लोकधर्मी हो गए । एक व्यक्ति या परिवार सभी की पूया करता था । जन्माष्टमी पर कृष्ण की और रामनवमी पर राम की । उसकी लोकभक्ति में कोई भद-भाव नहीं, कोई जटिलता नहीं और कोई कर्मकांड नहीं । एक मध्ययुगीन लोककथा में एक अहीर भक्त ' गोपीचंद' की जगह ' गपूचंद' जपता है और कृष्ण उसे अपना ही नाम (लाड़ को नाँउ अर्थात् प्यार का नाम) बताकर उसकी भक्ति को स्वीकृति देते हैं । मतलब यह है कि लोकभक्ति में भावना ही प्रधान थी और उसमें किसी तरह की कोई बाहरी जमावट नहीं थी । उसका लोकदर्शन भी सीधा और सरल था, वैचारिकता, जटिलता या भटकाव का स्पर्श तक नहीं । दोनों की कसौटी थी-उपयोगिता । चाहै राम, कृष्ण, शिव, हनुमान कोई भी हों, उन्हें व्यक्ति, परिवार, समाज और ग्राम के लिए उपयोगी सिद्ध होना ही चाहिए ।

राम की उपासना ने समाज को नया आदर्श दिया । आदर्श व्रयक्ति, परिवार, समाज और राज्य के लिए मर्यादा, त्याग, संयम, शील, कर्मनिष्ठा, शक्ति और धर्मपरायणता के उचित समन्वय की बानगी ने एक निश्चित प्रभाव छोड़ा, जिसका माध्यम थी तुलसी की ' रामचरितमानस' । इस जनपद के राजा और प्रजा, दोनों ने उसका लाभ उठाया । लोक ने मर्यादा और संघर्ष के संस्कार रामोपासना से लिए. जबकि प्रेम, आनंद और कर्म के-कृष्णोपासना से । दोनों के अलग-अलग त्यौहार, मंदिर और तीर्थ, लेकिन लोकगीतों में दोनों एक-से प्रतीक । संस्कारपरक गीतों में जन्म और शैशव-संबंधी कृष्ण के, तो विवाह संबंधी राम के । प्रेम और भक्ति-परक गीत जितने कृष्ण के हैं, उतने राम या शिव के नहीं । शिव के गीत तीर्थयात्रा और शिवरात्रि में तथा देवीगीत वर्ष में दो बार नवरात्र में । शिव और शक्ति (देवी), दोनों निम्न वर्ग में सर्वाधिक पूजित है, रामकृष्ण पर कोई पाबंदी तो नहीं, लेकिन वे अधिकतर सवर्णों तक सीमित हैं । ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग ने कुछ नियंत्रण स्थिर किए थे, जिनके फलस्वरुप शिव और शक्ति के भक्त सबसे ज्यादा हो गये । उनके चबूतरे मढ़ीयाँ और मंदिर भी अधिक संख्या में हैं । फिर हरदौल और दूल्हादेव के चबूतरे हर गाँव में स्थापित हैं और मंगतदेव, अजैपाल एवं कारसदेव के कहीं-कहीं । लोक तो अपने बीच के नर-नारियों को भी लोकदेवता बना लेता है, शर्त यह है कि उनमें कोई आदर्श, त्याग और चमत्कार हो । हरदौल दैवर-भौजी के प्रेम के आदर्श को नया प्रवर्तन दे सके, दूल्हादेव विवाह के वरदाता माने जाते हैं और मंगतदेव, अजैपाल, एवं कारसदेव वीरता के प्रतीक तथा आदर्श रक्षक रहे हैं । सती के चबूतरे पति-प्रेम की पराकाष्ठा के प्रतीक थे । मुस्लिम और मुगलकाल में उनका काफी जोर रहा, पर १९वीं शती के बाद उनका प्रभाव कम हो गया था । स्थानीय देवताओं की कमी नहीं है, हर नदी, घाट, पहाड़ी पर वे तब तक महत्त्वपूर्ण रहते हैं, जब तक उनकी उपयोगिता है ।

मध्ययुग में लोकभक्ति अधिकतर दो तरह की थी-(१) व्यक्तिधर्मी, जो अपने पति, संतान, धन-संपत्ति और कल्याण के लिए होती थी, जैसे-गनगौर-पूजन, वट-पूजान या सावित्री व्रत, संतान-सप्तमी-व्रत, लक्ष्मी-पूजन, भाई-दोज, मकरसंक्रांति के स्नान आदि, (२) समूहधर्मी, जो अपने वंश, जाति, समाज, गाँव और देश के कल्याण के लिए थी, जैसे-कुलदेवता की पूजा, कारसदेव-पूजन, खेरे की देवी या ग्रामदेवि का पूजन, दशहरा और होली में रावण एवं होलिका-दहन, भुईयाँ रानी (भूदेवी) की पूजा आदि । इस समय की राष्ट्रीय चेतना असुर अर्थात् अराष्ट्रीय तत्त्व के संहार में प्रतिबिम्बित होती है । एक देवी गीत है-" लिख-लिख पतियाँ भेजीं राम ने, तुम दुर्गा चलीं आओ हो माँ...." उसमें देवी दुर्गा का सिंह पर सवार होना, हथियारों से सजना एवं सभी देवताओं और शंकर का अनुसरण करना, चौंसठ योगिनियों का दल चलना तथा दानो (दानव) या असुर का संहार करना आदि का ओजमय वर्णन किया गया है । दरअसल यह लोकभक्ति में लिपटी राष्ट्रीय चेतना है, जिसका आभास लोकगीतों में ही नहीं, वरन् मध्ययुगीन भक्ति-काव्य में भी मिलता है । बुंदेलखंड में ऐसे काव्य की एक गतिशील परम्परा रही है ।

इस समय की पूजा-विधि और धार्मिक मान्यताएँ पुरानी ही थीं, लेकिन उसमें कुछ नयी रीतियाँ जुड़ गई थीं । यक्षों की सरल पूजा-विधि शंकर और मध्य-युग में प्रचलित रही ! ' पत्र-पुष्प' के बाद नारियल चढ़ाने से पूजा की पूर्णता होती थी । सवर्णों में पुरोहित वर्ग ने कर्मकांड़ पद्धति का चलन कर दिया था और सुत्रों तथा मनुस्मृति की पद्धतियों की दुहाई दी जाने

लगी । उधर असवर्णों को भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र आदि में पूरी तरह लिप्त रहना पड़ता था । इस तरह उत्तर-मध्ययुग में लोकधर्म पतनशील हो गया था । भाग्य पर भरोसा करने के कारण दासता से मुक्ति का द्वार न खोजा जा सका । तत्कालीन व्रतकथाओं से स्पष्ट है कि लोकधर्म व्यक्तिधर्मी बनकर सिकुड़ गया था और लोकचेतना का हास हो गया था ।

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पुनरुत्थान-काल का प्रारंभ १८४० ई. से मानना चाहिए, क्योंकि बुंदेलखंड की आजादी का संघर्ष इसी तिथि से शुरु हुआ था । जैतपुर के राजा पारीछत ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी थी और वचनबद्ध नरेशों के साथ न देने पर जनता और लोककवि, दोनों रणक्षेत्र में कूद पड़े थे । पारिछत के असफल होने पर १८४२ ई. में सागर जिले में विद्रोह की आग भड़क उठी । चंद्रपुर के जवाहिर सिंह और नारहट के मधुकरशाह बुंदेला तथा गणेश जू ने खिमलासा, खुरई, नरयावली, धामौनी और विनैका लूट लिये । नरसिंहपुर के देलनशाह गोंड़ भी विद्रोही हो गये । बाद में मधुकाशाह और गणेश जू बंदी बना लिए गये और उन्हें फाँसी तथा काले पानी की सजा मिली ।-१७ १८४० ई. से १८५७ ई. तक हरबोलों ने वीररसपरक गाथाएँ गा-गा कर जनता को संघर्ष के लिए तैयार किया और १८५७ की आजादी की लड़ाई ने तो लोकचेतना ही बदल दी ।-१८ इस जोशीली जलवायु में लोकधर्म की फसल भी बदली ।

कई इतिहासकारों ने १८५७ के विद्रोह का एक कारण यह अफवाह मानी है कि अंग्रेज हिन्दू-मुसलमानों को धर्मभ्रष्ट करने के लिए गाय और सुअर की चर्बी लगे कारतूस सैनिकों को दे रहे हैं । यह सही है कि अंग्रेजों ने भारत की धार्मिक स्थिति से काफी फायदा उठाया है, लेकिन यह कहना ठीक नहीं है कि वे कारतूसों से धर्मभ्रष्ट करने का विचार कर अपनी कूटनीतिक प्रतिभा को दिवालिया घोषित करते । वस्तुत: इस संक्रांतिकाल में लोक की लोकधर्मी दृष्टि इतनी व्यापक हो गई थी कि हिन्दू और मुसलमान-दोनों अपने धार्मिक भेदभाव भूलकर देश की आजादी के लिए साथ-साथ लड़े थे ।

ब्रह्मसमाज के संस्थापक राजा राममोहन राय (१७७४-१८३३ ई.) ने बताया कि सभी जातियों के लोगों को पूजा करने का अधिकार है । श्वामी दयानंद सरस्वती (१८२४-८३ ई.) ने आर्य समाज के द्वारा कर्मकांड और अंधविश्वासों को धर्म के खाते से बाहर कर दिया और ज्ञान को ज्यादा महत्त्व दिया । उनका मत था कि समस्त कार्य धर्म के अनुसार संपन्न हों, पर धर्म का सही स्वरुप ही नमूना बने । स्वामी विवेकानंद ने शिकागो के सर्वधर्म-सम्मेलन में हिंदू-धर्म पर अद्वितीय भाषण देकर भारत की श्रेष्ठता सिद्ध की और रामकृष्ण मिशन की स्थापना कर मानव-धर्म का संदेश दिया । इस पृष्ठभूमि में लोकधर्म का बदलाव अनिवार्य था। लोककवि ईसुरी ने लोकधर्म का संकेत किया था- 

दीपक दया धरम को जारौ, सदा रात उजयारौ ।

धरम करें बिन करम खुलै ना, बिना कुची ज्यौं तारौ ।

समझा चुके करें न रइयौ, दिया तरैं अँदयारौ ।

कात 'ईसुरी' सुन लो प्यारी, लग जै पार निबारौ ।।

तत्कालीन लोकधर्म में ज्ञान का प्रकाश प्रमुख तत्त्व था । धर्म, कर्म की कुंजी है, पर धर्मरुपी दीपक के नीचे अज्ञानरुपी अँधेरा नहीं रहना चाहिए । ' दया-धरम' बुंदेलखंड का मुहावरा है, जिसका अर्थ है-दया कौ धरम अर्थात् ऐसा धर्म, जिसमें दया या करुणा प्रधान हो । जाहिर है कि इस युग में लोकधर्म का मानवतावादी पक्ष उभरा था । उसका कर्मकांडी रुप दब गया था, वैसे परम्परित संस्कार और रुढियाँ ज्यों की-त्यों बनी थीं । स्वतंत्रता-संग्राम में पराजय और अंग्रेजों के कठोर दमन से इसी तरह का करुणापरक लोकधर्म जन्मा था ।

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आधुनिक काल

बिसवीं शती के तीसरे-चौथे दशक से फिर एक परिवर्तन-सा दिखाई पड़ता है, जब देश की आजादी की दूसरी लड़ाई शुरु होती है । एक तरफ देशप्रेम की अनोखी लहर, उत्साह की अँगड़ाइयाँ और संघर्ष की ऊर्जा, तो दूसरी तरफ अंग्रेजों तथा उनके सामंतों और पिटठुओं से भय । इस दोहरी मन:स्थिति में लोकमन ने जिस लोकधर्म को जिया है, उसका पता तत्कालीन लोककाव्य से मिलता है । दै फागें देखें-

अपने सिर पै मुकुट धराऊँ, काका देर न ल्याऊँ ।

द्रोण कर्ण की कौन चलाबै, जितै न सुरराऊ ।।

ठानौ समर कमर कस रन में, कायरपन न दिखाऊँ ।

' बोधन' व्यूह भेद कें साँचो, पारथ पूत कहाऊँ ।।

इन पंक्तियों में अभिमन्यु के मुख से आजादी का याद्धा बोल रहा है और पुराने क्षात्र-धर्म की याद दिला रहा है । अंतर केवल यह है कि पुराने क्षात्रधर्म में बलिदानी को स्वर्ग मिलता था, लेकिन अब उसकी जगह ' यश' मिलता है । इस परिवर्तन पर ध्यान दें-" ऐसे नर के मरैं, ईसुरी, जस गंगा लौ होबै ।" साथ ही " भैया अब सुराज के लानें, तन-मन सें लग जानें" के अनुसार लोकमन स्वराज्य के लिए पूरी तरह संकल्पित था । इसके अलावा लोकधर्म में फिर एक प्रखर बौद्धिकता के दर्शन होते हैं, जब लोककवि सारे कर्मकांड को ' पोप लीला' कहता है-

कैसी छाई हिये नादानी, करत सदा मनमानी ।

खीर खाँड़ को पिंड खाँय को, देत बनाकर सानी ।

ढोर समान मान पितृन कों, देत तलैयाँ पानी ।

जियें पिता की बात न पुँछी, मरें भये बरदानी ।

' बलदेव' तजे पोप लीला कों, तुम सों कहत बखानी ।।

इस तरह की ललकार तो बिरले ही दे सकते हैं, पर इतना निश्चित है कि कर्मकांड अधिकतर यांत्रिक हो गया था । आधुनिककाल में तो वह बोझ बन गया है । कोई भी व्यक्ति मन से उसका समर्थन नहीं करता । इसलिए उसकी सार्थकता पर एक प्रश्नचिह लटक रहा है । इसी तरह लोक हर देवता की पूजा करता है, जब जिसका अवकर हो । नारियाँ ही पूजा-रचा और उसके सम्भार में लगी रहती हैं । व्यक्तिधर्मी लोकधर्म का प्रसार ज्यादा है और बाकी समूहधर्मी तो दिखावे में शामिल हो गया है । परम्परागत मान्यताओं का पालन होता रहता है, क्योंकि नयी मान्यताएँ अभी नहीं बनी हैं । इस रुप में यह संक्रांतिकाल है और एक नये लोकधर्म के प्रारंभ की प्रतीक्षा है ।

अक्सर कहा जाता है कि आज की भौतिकतावादी संस्कृति में अध्यात्म और धर्म की ज्यादा जरुरत है । इसीलिए अध्यात्म और धर्म को साधन बनाकर भौतिकतापरक आवश्यकताएँ पुरी की जाती हैं । धार्मिक आग्रह उभरते हैं और कोई-न-कोई भौतिक प्यास बुझाते हैं । लेकिन लोकधर्म में न ते कोई मतवाद है और न कोई कट्टर आग्रह । वह कर्मकांड और पाखंड की खिलाफत करता है और करनी को ही कथनी का आधार मानता है । हर युग में लोक के बदलने पर बदलता है, पर उतना ही और उस रुप में, जितना और जिस रुप में वह लोक के लिए उपयोगी है । वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार लोकधर्म में काफी परिवर्तन दिखाई पड़ता है । देवी-देवता के प्रति न ते वह आस्था रह गई है और न धार्मिक मान्यताओं के प्रति वह निष्ठा । कर्मकांड को तो वह ढोंग कहकर नकार रहा है । इस स्थिति से स्पष्ट है कि वह निश्चित ही नये मानवीय मूल्यों का सहारा लेगा और व्यापक मानव-धर्म के रुप में प्रतिष्ठित होकर नयी दिशा देगा ।

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संदर्भ-संकेत

१. कादंबरी (एक सांस्कृतिक अध्ययन), वासुदेव शरण अग्रवाल, पृ. ४२,२२३ एवं हर्षचरित, पृ. ५७

२. प्राचीन भारतीय लोकधर्म, १९६४ ई., पृ. ३-४

३. वही, पृ. १२०

४. पद्मावता, डॉ. मोहनलाल शर्मा, १९७२ ई., पृ. ४३-४४

५. ऐनशिऐंट इंडियन हिस्टोरिकल ट्रेडिशंस, १९६२ ई., पृ. २८१

६. अंधकारयुगीन भारत, काशीप्रसाद जायसवाल, सं. १९९५, पृ. १०४

७. वही, पृ. २१४

८. चंदेल और उनका राजत्वकाल, केशवचंद्र मिश्र, सं. २०११, पृ. २०८

९. दि अर्ली रुलर्स आॅफ खजुराहो, डॉ. एस. के.मित्र, १९७७ ई. पृ. २३७, कालिं प्रस्तर अभिलेख नं. ५९

१०. प्रबोधचंद्रोदय, अंक ३, श्लोक १३

११. इंडियन एंटिक्वेरी, १९०८, भाग ३७, पृ. १३६-१३७

१२. वाल्मीकि रामायण किष्किंधा, ११/९४ महाभारत, आरण्यक, २५८/१५, २९७/२०-२१

१३. प्राचीन भारतीय लोकधर्म, पृ. १२६

१४. महद्यक्षं भुवनस्य मध्ये तपसिक्रांतं सलिलस्य पृष्ठे-अथर्ववेद ।

१५. पृध्वीराज रासो, परमाल रासो, जगतराज की दिग्विजय आदि में देखें ।

१६. बुंदेलखंड का मध्ययुगीन काव्य: एक ऐतिहासिक अनुशीलन, डॉ. नर्मदा प्रसाद गुप्त (टंकित शोध प्रबंध) ।

१७. बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास, गोरेलाल तिवारी, पृ. २९५, ३४२

१८. मेरा लेख-"हरबोलों की कबिताई", साप्ताहिक हिंदुस्तान, १३ मई, १९८४ ।

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© इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र पहला संस्करण: १९९५ 

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